एक ही मामले में तथ्य छिपाकर दो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दाखिल करना पड़ा भारी, हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाएं कीं खारिज; एसएसपी को एक महीने में हर्जाना देने का आदेश
बरेली/प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अनुराग आर्य के संबंध में पूर्व में की गई सख्त मौखिक टिप्पणियों पर खेद व्यक्त करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने एक ही प्रकरण में महत्वपूर्ण तथ्य छिपाकर दो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दाखिल करने वाले याचिकाकर्ता ओमेंद्र यादव की दोनों याचिकाएं खारिज कर दी हैं। साथ ही याचिकाकर्ता पर कुल 50 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है। यह धनराशि एक महीने के भीतर बरेली के एसएसपी अनुराग आर्य को देने का निर्देश दिया गया है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और अचल सचदेव की खंडपीठ का फैसला
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने की। अदालत के सामने बरेली निवासी ओमेंद्र यादव की दो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं थीं। याचिकाकर्ता का आरोप था कि बरेली पुलिस ने उसे 8 मई से 13 मई 2026 तक अवैध हिरासत में रखा और बाद में 13 मई को उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दिखाई।
याचिकाकर्ता ने पुलिस की कथित अवैध हिरासत को चुनौती देते हुए न्यायालय से राहत मांगी थी। हालांकि सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पहली याचिका में कथित हिरासत की तारीख, समय और स्थान के संबंध में पर्याप्त स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया था।
सीसीटीवी फुटेज को लेकर एसएसपी से मांगा गया था जवाब
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से संबंधित थाने की सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध कराने की मांग की गई थी। राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि तेज बारिश और तूफान के कारण शॉर्ट सर्किट हुआ था, जिससे सीसीटीवी सिस्टम और डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर प्रभावित हो गए।
इस स्पष्टीकरण पर अदालत ने सवाल उठाए और एसएसपी अनुराग आर्य से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा।
27 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि 13 से 15 मई के बीच आए तूफान से उससे पहले की रिकॉर्डिंग कैसे प्रभावित हो सकती थी। अदालत ने हलफनामे की विश्वसनीयता पर प्रारंभिक सवाल उठाते हुए एसएसपी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया था। Live Law Hindi +1
दूसरी याचिका में छिपाई पहली याचिका की जानकारी
मामले में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब अदालत के सामने यह तथ्य आया कि ओमेंद्र यादव ने पहले से लंबित याचिका की जानकारी दिए बिना उसी घटनाक्रम को लेकर दूसरी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर दी थी।
पहली याचिका संख्या 605/2026 में राज्य सरकार 18 मई को जवाबी हलफनामा दाखिल कर चुकी थी। इसके बावजूद 26 मई को दूसरी याचिका संख्या 746/2026 दाखिल की गई।
अदालत ने पाया कि दूसरी याचिका में पहली याचिका का उल्लेख नहीं था। खंडपीठ ने इसे महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने का मामला माना। NDTV India +1
हाईकोर्ट ने एसएसपी के प्रति जताया खेद
30 अक्टूबर के आदेश में खंडपीठ ने माना कि यदि पहली याचिका और उससे संबंधित तथ्यों की जानकारी शुरुआत में ही अदालत के सामने रखी गई होती, तो एसएसपी अनुराग आर्य को अनावश्यक रूप से अदालत की नाराजगी और सख्त मौखिक टिप्पणियों का सामना नहीं करना पड़ता।
अदालत ने एसएसपी के प्रति पूर्व में दिखाई गई अनुचित मौखिक सख्ती पर खेद व्यक्त किया। साथ ही अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता के कार्यालय की भूमिका पर भी सवाल उठाए कि संबंधित तथ्य समय रहते अदालत के सामने क्यों नहीं रखे गए।
25-25 हजार रुपये का हर्जाना, कुल 50 हजार देने होंगे
खंडपीठ ने दोनों बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं खारिज करते हुए प्रत्येक याचिका पर 25 हजार रुपये का हर्जाना लगाया। इस प्रकार याचिकाकर्ता ओमेंद्र यादव को कुल 50 हजार रुपये एसएसपी अनुराग आर्य को देने होंगे।
अदालत ने भुगतान के लिए एक महीने की समयसीमा निर्धारित की है। आदेश के अनुसार निर्धारित अवधि में रकम नहीं देने पर इसे भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूल किया जा सकेगा।
यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता, सही तथ्यों के खुलासे और अदालत के समक्ष ईमानदारी से पक्ष रखने के महत्व को रेखांकित करता है। हालांकि, इस आदेश का मुख्य आधार याचिकाकर्ता द्वारा महत्वपूर्ण तथ्य छिपाना और दोनों याचिकाओं की प्रक्रिया संबंधी खामियां थीं। इसे कथित अवैध हिरासत के हर तथ्य पर अलग से अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।






