पुलिस रिकॉर्ड में मुकदमा संख्या 491/2026 दर्ज, फिर भी इंस्पेक्टर पर FIR न लिखने का आरोप; बिना तथ्यों की पुष्टि किए खबर चलाने वाले कुछ न्यूज चैनलों की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल*
बरेली, 16 अक्टूबर 2026। बरेली के कैंट थाना क्षेत्र के परगवां गांव में कथित चोरी के मामले को लेकर कुछ न्यूज चैनलों की रिपोर्टिंग पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि पुलिस रिकॉर्ड की पूरी जानकारी लिए बिना कुछ चैनलों ने मुकदमा दर्ज नहीं होने की खबर प्रसारित की और कैंट थाना प्रभारी की कार्यशैली पर सवाल उठाए। जबकि उपलब्ध पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रकरण में 12 अक्टूबर 2026 को मुकदमा दर्ज किया जा चुका है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब पुलिस रिकॉर्ड में एफआईआर दर्ज है, तो फिर मुकदमा नहीं लिखे जाने का दावा किस आधार पर किया गया?
पुलिस रिकॉर्ड ने उठाए खबरों की विश्वसनीयता पर सवाल
पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक, ग्राम परगवां निवासी अमीर बानो पत्नी अजमत अली की शिकायत पर थाना कैंट में मुकदमा अपराध संख्या 491/2026 दर्ज किया गया है। यह मुकदमा भारतीय न्याय संहिता की धारा 309(4) और 351(3) के तहत दर्ज हुआ है।
मामले में बबलू, तस्लीम, तहसीम और दो अज्ञात व्यक्तियों को आरोपी बनाया गया है। पुलिस रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि न्यायालय के आदेश के अनुपालन में मुकदमा पंजीकृत किया गया।
इसके बावजूद कुछ चैनलों पर एफआईआर दर्ज नहीं होने का दावा किए जाने का आरोप है। हालांकि, संबंधित खबरों के प्रसारण की तारीख और मूल वीडियो की पुष्टि भी आवश्यक है, क्योंकि मुकदमा दर्ज होने से पहले और बाद की स्थिति अलग हो सकती है।
पूर्व जांच में नहीं हुई थी चोरी के आरोपों की पुष्टि
पुलिस के अनुसार, इस मामले की पहले भी जांच की गई थी। उस दौरान चोरी के आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी थी। जांच में दोनों पक्षों के बीच पारिवारिक विवाद और पुरानी रंजिश की बात सामने आई थी।
पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक, कथित चोरी की सूचना मिलने पर घटनास्थल का निरीक्षण किया गया था। मौके पर घर का कोई ताला टूटा हुआ नहीं मिला। किसी बाहरी व्यक्ति के घर में प्रवेश करने का स्पष्ट रास्ता भी सामने नहीं आया।
पुलिस ने इन परिस्थितियों को संदिग्ध माना था। हालांकि, पूर्व जांच में आरोप प्रमाणित नहीं होने का अर्थ यह नहीं है कि घटना के संबंध में अंतिम न्यायिक निर्णय हो चुका है।
पारिवारिक विवाद के बाद दी गई थी चोरी की सूचना
पुलिस रिपोर्ट में बताया गया है कि शिकायतकर्ता और दूसरे पक्ष के बीच पहले से पारिवारिक विवाद चल रहा था।
दूसरे पक्ष की रिश्तेदार रेशमा की ओर से कैंट थाने में मुकदमा संख्या 414/2026 दर्ज कराया गया था। पुलिस के अनुसार, कथित चोरी की सूचना से एक दिन पहले दोनों पक्षों की महिलाओं के बीच कहासुनी हुई थी।
रेशमा ने जनसुनवाई में शिकायत भी दी थी। इसके बाद चोरी की सूचना सामने आई। पुलिस ने पूर्व जांच में इन परिस्थितियों को आपसी रंजिश से जोड़कर देखा था।
तथाकथित पत्रकारों की रिपोर्टिंग पर तीखे सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल उन मीडिया रिपोर्टों की तथ्यात्मक सटीकता को लेकर है, जिनमें पुलिस पर मुकदमा दर्ज नहीं करने का आरोप लगाया गया।
क्या संबंधित चैनलों ने खबर प्रसारित करने से पहले पुलिस से एफआईआर की स्थिति पूछी थी? क्या मुकदमा संख्या और न्यायालय के आदेश की जानकारी जुटाई गई थी? क्या पुलिस का आधिकारिक पक्ष खबर में शामिल किया गया था?
यदि एफआईआर दर्ज होने के बाद भी उसे दर्ज नहीं होने की बात कही गई, तो यह रिपोर्टिंग की गंभीर तथ्यात्मक चूक हो सकती है।
कुछ तथाकथित पत्रकारों पर एकतरफा और भ्रामक खबरें चलाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। हालांकि, किसी पत्रकार की मंशा या जानबूझकर गलत सूचना फैलाने का निष्कर्ष ठोस प्रमाणों के बिना नहीं निकाला जा सकता।
क्या पुलिस की छवि खराब करने का प्रयास हुआ?
इस प्रकरण में थाना प्रभारी पर लगाए गए आरोपों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पुलिस रिकॉर्ड में मुकदमा दर्ज होने का उल्लेख है, इसलिए किसी भी रिपोर्ट में एफआईआर की तारीख और शिकायत के घटनाक्रम को स्पष्ट करना जरूरी है।
बिना इन तथ्यों को सामने रखे पुलिस की निष्क्रियता का दावा करना पाठकों और दर्शकों को अधूरी जानकारी दे सकता है।
हालांकि, पुलिस की पूर्व जांच और कार्रवाई भी स्वतंत्र समीक्षा के दायरे में आती है। एफआईआर दर्ज होने से यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि पुलिस की प्रत्येक कार्रवाई सही थी।
अब विस्तृत विवेचना से सामने आएगी सच्चाई
पुलिस के मुताबिक, न्यायालय के आदेश पर मुकदमा दर्ज करने के बाद मामले में गहराई से साक्ष्य संकलित करने और नियमानुसार विवेचना पूरी करने की कार्रवाई की जा रही है।
*इस पूरे प्रकरण में दो बातें महत्वपूर्ण हैं। पहली, उपलब्ध पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार एफआईआर दर्ज है। दूसरी, पूर्व जांच में चोरी के आरोपों की पुष्टि नहीं हुई थी। अब संबंधित मीडिया रिपोर्टों की तारीख, उनके दावों और पुलिस रिकॉर्ड का मिलान होना चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि गलत जानकारी किस स्तर पर सामने आई। निष्पक्ष पत्रकारिता की पहचान सनसनी नहीं, बल्कि प्रमाणित तथ्यों के आधार पर खबर प्रस्तुत करना है






