नई दिल्ली: देश में चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच अब मामला सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तक पहुंच गया है। इंडिया ब्लॉक के नेताओं ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत से मुलाकात का समय मांगा था। विपक्षी नेताओं का उद्देश्य कथित चुनावी अनियमितताओं, मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़ी चिंताओं को उनके सामने रखना था। लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने इस मुलाकात के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है।
राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने क्यों मांगा था समय?
कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी तथा राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात के लिए अनुरोध किया था। विपक्षी नेताओं की योजना थी कि वे सीजेआई को एक ज्ञापन सौंपकर चुनावी प्रक्रिया से संबंधित अपनी चिंताओं से अवगत कराएं।
विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दौरान कई मतदाताओं के नाम हटाए जाने और चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। विपक्षी दल इस मुद्दे पर चुनाव आयोग की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई और उनके इस्तीफे की मांग भी विपक्ष के आंदोलन का हिस्सा रही है।
सीजेआई सूर्यकांत ने मुलाकात से क्यों किया इनकार?
11 अक्टूबर को मिले पत्र के जवाब में मुख्य न्यायाधीश ने उसी रात विपक्षी नेताओं को अपनी असमर्थता से अवगत करा दिया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इसके पीछे एक अहम वजह यह थी कि विपक्ष जिन मुद्दों को उठाना चाहता था, उनसे संबंधित मामले पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं।
न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए सीजेआई ने संकेत दिया कि ऐसे मुद्दों पर ज्ञापन के जरिए प्रशासनिक स्तर पर हस्तक्षेप करने के बजाय न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लिया जाना चाहिए। अदालत के प्रशासनिक पक्ष से सरकार या अन्य संवैधानिक संस्थाओं को निर्देश देने और न्यायिक सुनवाई के माध्यम से राहत देने के बीच अंतर होता है।
इसलिए विपक्ष के लिए उचित रास्ता यह है कि वह संबंधित मुद्दों पर याचिका दाखिल करे और अदालत से कानून के अनुसार सुनवाई तथा राहत की मांग करे। हालांकि, मुलाकात से इनकार करने के संबंध में सीजेआई के पत्र की पूरी सामग्री सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है। ऐसे में पत्र में दर्ज सभी कारणों के बारे में निश्चित रूप से दावा करना उचित नहीं होगा।
‘सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं’
12 अक्टूबर को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 33वें स्थापना दिवस समारोह के बाद पत्रकारों से बातचीत के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि उन्हें मुलाकात के अनुरोध से संबंधित पत्र मिला था और उन्होंने उसी रात जवाब देते हुए मुलाकात नहीं कर पाने के कारण बताए थे।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे हर नागरिक के लिए खुले हैं। कोई भी आम नागरिक या निर्वाचित प्रतिनिधि याचिका दाखिल करके अदालत से कानूनी राहत मांग सकता है। अदालत मामले को सुनकर कानून के तहत उचित निर्णय ले सकती है।
सीजेआई के इस बयान का मुख्य संदेश यह है कि न्याय पाने के लिए अदालत तक पहुंचने का रास्ता सभी के लिए उपलब्ध है, लेकिन किसी राजनीतिक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात और अदालत में विधिवत याचिका के माध्यम से सुनवाई दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
क्या विपक्ष को अब अदालत का रुख करना होगा?
मुख्य न्यायाधीश के जवाब के बाद विपक्ष के सामने अपनी शिकायतों को न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से उठाने का विकल्प मौजूद है। चुनावी अनियमितताओं, SIR और चुनाव आयोग से संबंधित जिन मुद्दों पर पहले से मामले लंबित हैं, उन पर संबंधित याचिकाओं और अदालत की कार्यवाही के जरिए विचार किया जा सकता है।
इंडिया ब्लॉक के नेताओं की मांगें राजनीतिक और संवैधानिक बहस का विषय बनी हुई हैं। विपक्ष चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहा है, जबकि इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष संबंधित तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
अब पूरे मामले में आगे क्या होगा?
सीजेआई सूर्यकांत के मुलाकात से इनकार के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि विपक्ष इस मुद्दे पर आगे कौन-सा कानूनी और राजनीतिक रास्ता अपनाता है। क्या विपक्षी दल अदालत में नई याचिका दाखिल करेंगे, क्या पहले से लंबित मामलों में जल्द सुनवाई की मांग करेंगे और SIR को लेकर उनकी आपत्तियों पर अदालत का क्या रुख होगा—इन सवालों पर आगे की घटनाओं से स्थिति स्पष्ट होगी।
फिलहाल, सीजेआई का स्पष्ट संदेश है कि सुप्रीम कोर्ट सभी नागरिकों के लिए खुला है और कानूनी राहत पाने के लिए निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। वहीं, विपक्ष की ओर से उठाए गए चुनावी अनियमितताओं के आरोपों का अंतिम मूल्यांकन संबंधित साक्ष्यों, कानूनी दलीलों और अदालत के फैसलों के आधार पर ही किया जाएगा।






