अशोक कुमार श्रीवास की रिपोर्ट
कोरबा/करतला/देश आजादी के 75 साल से ज्यादा का सफर तय कर चुका है। सरकारें विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं, लेकिन कोरबा जिले के करतला विकासखंड के ग्राम पंचायत बरकोन्हा के ग्रामीण आज भी एक पुल के लिए तरस रहे हैं।
बरसात शुरू होते ही कोरजा नाला उफान पर आ जाता है और विकास के दावों की पोल खोल देता है। नाला ऐसा उफनता है कि जामचुवां, पतरापाली और भदरापारा जैसे क्षेत्रों का संपर्क लगभग कट जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ग्रामीणों को कब तक सिर्फ आश्वासन का पुल दिखाया जाएगा?
बरसात आते ही स्कूली बच्चों की पढ़ाई पर ब्रेक लग जाता है। बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पाते, किसान खेतों तक नहीं जा पाते और मवेशियों को लाना-ले जाना भी किसी जोखिम भरे अभियान से कम नहीं रहता।
ग्रामीणों का आरोप है कि विधायक से लेकर सांसद और मंत्रियों तक कई बार गुहार लगाई गई, आवेदन दिए गए, मांग रखी गई, लेकिन नतीजा आज भी शून्य है। हर चुनाव में वादे हुए, लेकिन पुल नहीं बना।
हैरानी की बात यह है कि पतरापाली और भदरापारा के ग्रामीणों को सिर्फ राशन लेने के लिए लगभग 10 किलोमीटर का अतिरिक्त सफर तय करना पड़ता है। सवाल उठता है कि जब सरकार घर-घर विकास पहुंचाने का दावा करती है तो फिर इन ग्रामीणों को मूलभूत सुविधा के लिए इतना संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है?
सरपंच प्रतिनिधि अंतराम राठिया ने साफ कहा है कि वर्षों से ग्रामीण पुल निर्माण की मांग कर रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग और जनप्रतिनिधि सिर्फ आश्वासन दे रहे हैं।
अब ग्रामीणों का सब्र जवाब देने लगा है। उनका कहना है कि यदि जल्द पुल निर्माण की स्वीकृति और निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ तो वे लोकतांत्रिक तरीके से बड़ा आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
सबसे बड़ा सवाल…
जब एक पुल हजारों लोगों की जिंदगी आसान बना सकता है, बच्चों की पढ़ाई बचा सकता है और किसानों की परेशानी कम कर सकता है, तो आखिर इस पुल को बनने से रोक कौन रहा है?
क्या जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं?
या फिर कोरजा नाला पर पुल सिर्फ चुनावी भाषणों तक ही सीमित रहेगा?
फिलहाल ग्रामीणों की नजरें शासन-प्रशासन पर टिकी हैं,








