इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली के अधिकारियों के खिलाफ एक सख्त कदम उठाते हुए इस मामले को अभिव्यक्ति और धार्मिक स्वतंत्रता के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण बना दिया है।
घटना 16 जनवरी 2026 की है। बरेली के बिसारतगंज थाना क्षेत्र के मोहम्मदगंज गांव में रेशमा खान नामक महिला के निजी घर में कुछ लोग सामूहिक रूप से नमाज़ अदा कर रहे थे।
गांव के कुछ हिंदू परिवारों ने इसका विरोध किया और पुलिस से शिकायत की कि “नई परंपरा” शुरू की जा रही है और घर को मस्जिद या मदरसे में बदलने की कोशिश हो सकती है।
पुलिस ने मौके पर पहुँचकर नमाज़ रुकवा दी और तारिक खान सहित 12 लोगों को हिरासत में लिया था, जिन्हें बाद में चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डिवीजन बेंच ने इस मामले में हस्तक्षेप किया। कोर्ट ने अपने 27 जनवरी 2026 के एक पुराने फैसले (मरानाथ फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज बनाम यूपी राज्य) का जिक्र किया।
“भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत, किसी भी नागरिक को अपने निजी परिसर के भीतर प्रार्थना करने के लिए सरकार या पुलिस की अनुमति की आवश्यकता नहीं है, बशर्ते वह गतिविधि सार्वजनिक स्थान या सड़क पर न फैले।”






