भारतीय रुपया एक बार फिर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुँच गया है। डॉलर के मुकाबले 90 के पार जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है क्या कभी रुपया डॉलर के जितना मजबूत था? और अगर हाँ, तो आखिर वो कब और कैसे गिरता चला गया?
आइए जानते हैं भारतीय मुद्रा के उतार
चढ़ाव की वो कहानी, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।सबसे पहले, क्या कभी डॉलर और रुपया बराबर थे?कई लोगों को यह जानकर हैरानी होती है कि आज़ादी के शुरुआती दौर में भारतीय रुपया और अमेरिकी डॉलर लगभग बराबर थे। विभाजन के बाद भारत ने अपनी मुद्रा को पाउंड और डॉलर जैसी विदेशी मुद्राओं से जोड़ने का फैसला किया। उस समय रुपया मजबूत था क्योंकि भारत के पास सोने का बड़ा भंडार और स्थिर आर्थिक ढांचा मौजूद था। फिर गिरावट कैसे शुरू हुई?
1. 1950–1970: आयात बढ़ा, विदेशी मुद्रा घटती गईइस दौर में भारत का आयात बढ़ा लेकिन निर्यात उतना तेज़ नहीं बढ़ सका। विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ा और रुपया कमजोर होने लगा।
2. 1971: डॉलर का ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ से अलग होनाअमेरिका ने डॉलर को सोने से अलग कर दिया। इससे दुनिया भर की मुद्राओं की कीमत में भारी उतार–चढ़ाव आया और रुपया भी प्रभावित हुआ।
3. 1991 की आर्थिक आपात स्थितिभारत के पास सिर्फ कुछ हफ्तों का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था। IMF की शर्तों के साथ रुपये का बड़ा अवमूल्यन हुआ और डॉलर की तुलना में रुपये की गिरावट तेज़ होती चली गई।
आज हालात कैसे हैं?
भारतीय रुपया पिछले एक दशक में लगातार दबाव में रहा है कच्चे तेल की बढ़ती कीमतेंआयात पर भारी निर्भरतावैश्विक मंदी और पूँजी का विदेशों में पलायनडॉलर के मजबूत होने और वैश्विक अस्थिरता से रुपये की कमजोरी और बढ़ी है, जिसका असर बाजार से लेकर आम लोगों की जेब तक पर पड़ रहा है।
आगे क्या? विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
अर्थशास्त्रियों के अनुसार रुपये का यह स्तर स्थायी नहीं हैस्थिर विदेशी निवेश और मजबूत निर्यात नीति से कुछ राहत मिल सकती हैसरकार डिजिटल पेमेंट और निर्यात बढ़ाकर रुपये को मजबूत करने की कोशिश कर सकती हैलेकिन फिलहाल डॉलर की लगातार बढ़त और वैश्विक तनाव रुपये पर दबाव बनाए हुए हैं।






