खुर्शीद अहमद सिद्दीकी
गुलाम-ए-मुस्तफ़ा
अफ़सोस और चिंता का विषय है कि भारत की संसद में मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि मौजूद हैं और धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाली राजनीतिक पार्टियाँ भी देश की राजनीति में सक्रिय हैं, लेकिन इसके बावजूद सहारनपुर न्यायालय परिसर में स्थित एक मस्जिद, जिसके बारे में यह बताया जा रहा है कि वह वर्ष 1911 से भी पहले से अस्तित्व में थी, प्रशासनिक कार्रवाई के तहत सुबह-सवेरे जमींदोज़ कर दी गई।
यह घटना केवल एक इमारत के गिराए जाने का मामला नहीं है, बल्कि इससे लोकतंत्र, प्रशासनिक शक्ति, जनप्रतिनिधियों की भूमिका और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर अनेक गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
सवाल यह है कि यह लोकतंत्र है या राजशाही?
क्षेत्र के सांसद और अन्य जनप्रतिनिधि अपने-अपने घरों में ही रह जाते हैं और प्रशासन की इस कार्रवाई को रोकने में असहाय दिखाई देते हैं। यदि एक निर्वाचित सांसद भी अपने क्षेत्र में किसी ऐसी कार्रवाई को रोकने या उस पर प्रभावी हस्तक्षेप करने में असमर्थ है, जिसे लेकर गंभीर कानूनी और स्वामित्व संबंधी प्रश्न मौजूद हैं, तो क्या यह नहीं लगता कि प्रशासनिक शक्ति का प्रभाव जनप्रतिनिधियों से भी अधिक हो गया है?
अब क्या करें, जब चिड़िया चुग गई खेत?
सांसद इमरान मसूद का कहना है कि अब वह उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाएंगे और उनके पास मिल्कियत से संबंधित दस्तावेज मौजूद हैं, जिनके आधार पर उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद है।
लेकिन यहां एक स्वाभाविक सवाल उठता है।
यदि पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से इस मामले में मुकदमा चल रहा था और संबंधित दस्तावेज मौजूद थे, तो क्या वे दस्तावेज निचली अदालतों के समक्ष प्रस्तुत किए गए? यदि किए गए थे तो उन पर प्रभावी सुनवाई क्यों नहीं हुई? और यदि निचली अदालत में सुनवाई नहीं हो रही थी, तो उच्च न्यायालय का रुख पहले ही क्यों नहीं किया गया?
क्या यह संभव नहीं कि आपसी राजनीतिक या सामाजिक गुटबाज़ी, प्रशासनिक प्रक्रिया और कानूनी रणनीति की कमी के बीच एक ऐतिहासिक धार्मिक स्थल को अपूरणीय क्षति पहुंच गई?
अब सवाल यह भी है कि जब चिड़िया चुग गई खेत, तब दस्तावेज़ लेकर न्याय की तलाश कितनी प्रभावी होगी?
जमीन का अधिग्रहण हुआ तो मस्जिद की भूमि का क्या हुआ?
एक महत्वपूर्ण कानूनी और राजस्व संबंधी प्रश्न यह भी है कि यदि न्यायालय परिसर के लिए सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहित की गई थी, तो उस भूमि में स्थित मस्जिद की भूमि की स्थिति क्या थी?
क्या मस्जिद की भूमि को अधिग्रहण की प्रक्रिया से कानूनी रूप से अलग चिह्नित किया गया था?
क्या उसकी अलग बाउंड्री कराई गई थी?
क्या संबंधित भूमि का राजस्व अभिलेखों में अलग से इंद्राज था?
यदि मस्जिद की स्थिति वक़्फ़-बाय-यूज़र के रूप में थी, तो क्या उससे संबंधित अभिलेख और दस्तावेज़ समय-समय पर वक़्फ़ बोर्ड के रिकॉर्ड में अपडेट किए गए थे?
यदि ऐसा नहीं किया गया, तो अब उच्च न्यायालय में उस संपत्ति के स्वामित्व अथवा धार्मिक उपयोग की स्थिति साबित करने के लिए कौन-कौन से कानूनी प्रावधान और दस्तावेज़ निर्णायक होंगे?
ये केवल सहारनपुर के एक मामले के सवाल नहीं हैं। ये पूरे मुस्लिम समाज के लिए एक चेतावनी हैं।
हमारी सबसे बड़ी कमी: संपत्तियों का रिकॉर्ड कहां है?
शायद पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा और विशेष रूप से हमारी राजनीतिक एवं धार्मिक नेतृत्व व्यवस्था तथा सामाजिक संगठनों को इस दिशा में गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।
हमारे बीच ऐसे अनेक लोग हैं जो प्रतिदिन वीडियो जारी करते हैं, भावनात्मक भाषण देते हैं और मुसलमानों के हित में नई-नई रणनीतियों की बातें करते हैं। लेकिन क्या हमने कभी व्यवस्थित रूप से अपनी मस्जिदों, मदरसों, कब्रिस्तानों और अन्य धार्मिक-सामुदायिक संपत्तियों की मिल्कियत और कानूनी स्थिति की चेकलिस्ट तैयार की?
क्या हमारे पास प्रत्येक संपत्ति के संबंध में—
मूल स्वामित्व दस्तावेज़,
पुराने राजस्व रिकॉर्ड,
नक्शा और सीमांकन,
अधिग्रहण से संबंधित दस्तावेज़,
वक़्फ़ रिकॉर्ड,
वक़्फ़-बाय-यूज़र की स्थिति,
न्यायालयों में लंबित मुकदमों का विवरण,
और वर्तमान रिकॉर्ड में दर्ज स्थिति
का एक व्यवस्थित और डिजिटल डेटाबेस है?
यदि नहीं है, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि केवल भाषणों और वीडियो से हमारी संपत्तियों की रक्षा नहीं हो सकती।
काश, हमारी सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं ने समय रहते इन संपत्तियों का रिकॉर्ड तैयार किया होता, दस्तावेज़ों को अद्यतन रखा होता और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें न्यायालयों के सामने मजबूती से प्रस्तुत किया होता। शायद तब ऐसी पीड़ादायक घटनाओं को रोकने की संभावना अधिक होती।
संविधान के अधिकार और उनकी सीमाओं को समझना होगा
अब भी समय है कि हम भावनात्मक नारों और झूठी शान-ओ-शौकत से बाहर निकलें और अपने संवैधानिक अधिकारों को गंभीरता से समझें।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है, लेकिन यह स्वतंत्रता पूर्ण और निरंकुश नहीं है। संविधान स्वयं इसे public order, morality and health तथा अन्य संवैधानिक प्रावधानों के अधीन रखता है।
इसलिए हमें अपने अधिकारों के साथ-साथ उन कानूनी प्रक्रियाओं को भी समझना होगा जिनके माध्यम से इन अधिकारों और धार्मिक संपत्तियों की रक्षा की जा सकती है।
आज देश में धार्मिक स्थलों, मदरसों, मुस्लिम बस्तियों और अन्य संपत्तियों से जुड़े विवादों में अतिक्रमण अथवा अन्य प्रशासनिक आधारों पर कार्रवाई के मामले सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि कानून का शासन समान रूप से और उचित प्रक्रिया के साथ लागू हो।
यदि किसी संपत्ति के संबंध में विवाद है, तो उसका समाधान कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए। किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई में प्राकृतिक न्याय, उचित प्रक्रिया और न्यायालयों के निर्देशों का पालन सर्वोपरि होना चाहिए।
बाबरी मस्जिद से लेकर आज तक: इतिहास से सबक लेना होगा
बाबरी मस्जिद का विवाद भारतीय समाज और न्याय व्यवस्था के इतिहास का अत्यंत संवेदनशील अध्याय है। उसके बाद भी धार्मिक स्थलों और संपत्तियों को लेकर विवाद समाप्त नहीं हुए।
इसलिए मुस्लिम समाज को केवल घटनाओं के बाद प्रतिक्रिया देने की रणनीति से आगे बढ़ना होगा।
जब कोई मस्जिद गिराई जाती है, तब वीडियो जारी करना, बयान देना और आक्रोश व्यक्त करना स्वाभाविक है। लेकिन उससे पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि उस मस्जिद के पास उसके अस्तित्व, भूमि और उपयोग से संबंधित सभी कानूनी दस्तावेज़ सुरक्षित और अद्यतन हों।
भावना आवश्यक है, लेकिन दस्तावेज़ उससे भी अधिक आवश्यक हैं।
आखिर नंबर दो का नागरिक किसे कहते हैं?
आज हमें एक असहज लेकिन महत्वपूर्ण सवाल पूछना चाहिए—
क्या वह व्यक्ति अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक महसूस करेगा जिसकी बात संसद में पर्याप्त प्रभाव के साथ नहीं सुनी जाती, प्रशासन के सामने जिसकी आवाज़ कमजोर पड़ जाती है और न्यायालय तक पहुंचने से पहले ही उसकी संपत्ति पर कार्रवाई हो जाती है?
चाहे वह सांसद हो, धार्मिक नेता हो, सामाजिक कार्यकर्ता हो या एक सामान्य नागरिक—यदि उसकी वैध शिकायत को सुनने और कानून के अनुसार उसका समाधान करने की व्यवस्था प्रभावी नहीं है, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
लेकिन इसका उत्तर केवल शिकायत और भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं हो सकता।
अब सिर जोड़कर रणनीति बनाने का समय है।
वीडियोबाज़ी नहीं, संस्थागत तैयारी चाहिए
मुस्लिम समाज को अब ऐसी संस्थागत व्यवस्था की आवश्यकता है जो देशभर की मस्जिदों, मदरसों, कब्रिस्तानों और अन्य सामुदायिक संपत्तियों का कानूनी रिकॉर्ड तैयार करे।
हर संपत्ति की फाइल हो।
हर दस्तावेज़ का डिजिटल बैकअप हो।
हर संपत्ति का सीमांकन हो।
राजस्व रिकॉर्ड की नियमित जांच हो।
वक़्फ़ रिकॉर्ड अद्यतन हों।
विवादित संपत्तियों की अलग कानूनी निगरानी हो।
और अनुभवी अधिवक्ताओं की एक टीम ऐसे मामलों पर समय रहते कार्रवाई करे।
यह काम किसी एक सांसद, किसी एक राजनीतिक दल या किसी एक धार्मिक संगठन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
यह पूरे समाज की संस्थागत जिम्मेदारी है।
हमारे सिख समाज से भी हमें एक महत्वपूर्ण सबक सीखने की आवश्यकता है—धार्मिक और सामुदायिक संपत्तियों की सुरक्षा केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि संगठन, दस्तावेज़, संस्थागत अनुशासन और सामूहिक जागरूकता से होती है।
अभी भी समय है
सहारनपुर की घटना को केवल एक मस्जिद के टूटने की घटना मानकर भूल जाना सबसे बड़ी भूल होगी।
इसे एक चेतावनी के रूप में लेना चाहिए।
हमें यह तय करना होगा कि आगे से किसी भी मस्जिद, मदरसे, कब्रिस्तान या सामुदायिक संपत्ति के बारे में हमें कार्रवाई होने के बाद दस्तावेज़ तलाशने हैं या कार्रवाई से बहुत पहले अपने सभी कानूनी दस्तावेज़ तैयार रखने हैं।
राजनीति अपनी जगह है।
धार्मिक नेतृत्व अपनी जगह है।
प्रशासन अपनी जगह है।
अदालतें अपनी जगह हैं।
लेकिन किसी समुदाय की संपत्ति की रक्षा के लिए उस समुदाय को स्वयं भी कानून, दस्तावेज़ और संस्थागत व्यवस्था के स्तर पर तैयार रहना होगा।
सिर्फ़ भावनात्मक भाषण नहीं, कानूनी जागरूकता।
सिर्फ़ वीडियो नहीं, दस्तावेज़।
सिर्फ़ विरोध नहीं, रणनीति।
सिर्फ़ नेतृत्व नहीं, संस्थागत तैयारी।
और सबसे बढ़कर—अपने संवैधानिक अधिकारों को समझना तथा उन्हें संविधान और कानून के दायरे में प्रभावी ढंग से सुरक्षित करना।
“सिर्फ़ सुन्नत का तरीक़ा ही, ऐ मुसलमानों, तुम्हारे वजूद को बचा सकता है।”
सहारनपुर की यह घटना हमें यही सोचने पर मजबूर करती है कि अगर हम आज भी नहीं जागे और अपनी नई नस्लों को बेदार नहीं किया, तो कल हमारे पास केवल अफ़सोस करने के लिए इतिहास बचेगा।






