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इल्म से इंसानी उद्धार: मंज़िल दर मंज़िल तरक़्क़ी का सफ़र”

शिक्षा से इंसानी उद्धार
मंज़िल ब मंज़िल बढ़ाए जा,
क़दम तू अपने जमाए जा।
इंसान का बच्चा जब पैदा होता है, तो वह दुनिया और अपने आसपास के माहौल से बिल्कुल बेख़बर, ला-शऊर और अनजान होता है। इसके विपरीत, एक जानवर का बच्चा जन्म लेते ही अपनी बुनियादी ज़रूरतों को पहचान लेता है—उसे माँ के दूध तक पहुँचने का सहज ज्ञान होता है। यानी उसकी मंज़िल का एहसास उसे जन्म से ही होता है।
लेकिन इंसान को अपनी मंज़िल खुद तलाश करनी पड़ती है। उसे यह समझना होता है कि वह क्यों पैदा हुआ है, और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए उसे लगातार कोशिश करनी होती है। यही इंसानी फ़ितरत है।
हमारे ख़ालिक ने इंसानी विकास के लिए स्पष्ट हिदायतें दी हैं। सबसे पहली मंज़िल है—अपने पैदा करने वाले को पहचानना और अपने रिज़्क का सही रास्ता अपनाना।
इसके बाद इंसान को अपने पैरों पर खड़ा होना और कुदरत की शक्ति को समझना होता है। फिर आती है वह अहम मंज़िल, जिसका ज़िक्र “इक़रा” (पढ़ो) के रूप में किया गया—यानी ज्ञान की शुरुआत। यही पहला हुक्म है जो इंसान को अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जाता है।
इसके बाद कलम का इस्तेमाल कर पढ़ना-लिखना सीखना, ताकि एक उम्मी (अनपढ़) इंसान आलिम और समझदार बन सके। यही इल्म इंसान को तरक़्क़ी की राह पर आगे बढ़ाता है।
फिर इंसान को चाहिए कि वह इस कायनात, कुदरत और अल्लाह की निशानियों पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करे, और अपने रब को पहचाने।
अक्सर इंसान अपनी असल मंज़िल से भटक जाता है, क्योंकि वह इल्म से दूर हो जाता है। दुनियावी चमक-दमक और कम इल्मी उसे अपने असली मक़सद से दूर कर देती है। शैतान इसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाकर इंसान को उसके रब से किए वादे से भटका देता है।
माँ-बाप या समाज भले ही सही राह से भटक जाएं, लेकिन हर इंसान की ज़िम्मेदारी है कि वह दीन-ए-हक़ को अपनाए—और यह बिना इल्म के मुमकिन नहीं।
अगली मंज़िल है—”ज़मीन पर चलो, देखो और सीखो”। यानी दुनिया की सैर कर, कुदरत के नियमों को समझो। साइंस और प्रकृति के अध्ययन से भी इंसान अपने रब को पहचान सकता है।
इसलिए इंसान को दो तरह के इल्म की ज़रूरत है:
इल्म-ए-रूहानी (आध्यात्मिक ज्ञान)
इल्म-ए-जिस्मानी (दुनियावी/वैज्ञानिक ज्ञान)
जब ये दोनों साथ आते हैं, तभी इंसान अपनी आख़िरी मंज़िल—अपने रब की रज़ामंदी—हासिल कर सकता है।
इस संदेश को इतना पढ़ो और समझो कि यह दिल में उतर जाए। तब ही इंसान दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी हासिल कर सकता है।
असल कामयाबी यही है कि इंसान को हुक्म मिले:
“पढ़ता जा और आगे बढ़ता जा।”
निष्कर्ष:
इंसान की तरक़्क़ी का रास्ता सिर्फ इल्म से होकर गुजरता है—चाहे वह रूहानी हो या दुनियावी। दोनों का संतुलन ही इंसान को उसकी असली मंज़िल तक पहुंचाता है।
नबी का उम्मी से मुअल्लिम बनने का सफ़र यह पैग़ाम देता है कि हर इंसान को इल्म हासिल करना चाहिए और उसे अपनी ज़िंदगी में लागू करना चाहिए। यही इंसानी फ़लाह और कामयाबी का रास्ता है।
— खुर्शीद सिद्दीकी

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