नवरात्रि के छठे दिन गोरखपुर के चौरी-चौरा क्षेत्र में स्थित मां तरकुलहा देवी मंदिर में सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें लग गईं। गोरखपुर शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर, ताड़ के पेड़ों से घिरे इस पवित्र स्थल पर श्रद्धालु न केवल पूर्वांचल, बल्कि बिहार, नेपाल, मध्य प्रदेश, असम और अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
यहां मान्यता है कि मां तरकुलहा देवी मनोकामना पूर्ण होने पर बकरे की बलि स्वीकार करती हैं। भक्तजन, मन्नत पूरी होने के बाद बकरे की बलि चढ़ाते हैं, और उसी बकरे को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। कहा जाता है कि इस प्रसाद का स्वाद विशिष्ट और विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
मंदिर का इतिहास भी अत्यंत प्रेरणादायक है। यह स्थल डुमरी रियासत के वीर स्वतंत्रता सेनानी बाबू बंधू सिंह से जुड़ा है, जो अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते थे। प्रत्येक जीत के बाद वे अपने शत्रुओं का सिर मां को अर्पित करते थे। अंग्रेजों ने जब उन्हें फांसी की सजा दी, तो कहा जाता है कि पहली सात बार फांसी का फंदा टूट गया। आठवीं बार उन्होंने स्वयं मां से प्रार्थना कर बलिदान दिया।
मान्यता है कि उसी समय पास के तरकुल के पेड़ से रक्त बह निकला, और उसी स्थान पर मां तरकुलहा का मंदिर स्थापित हुआ। आज यह मंदिर श्रद्धा और शक्ति का प्रतीक बन चुका है, जहां हजारों भक्त हर साल आकर मन्नतें मांगते हैं।






