लोकतांत्रिक भारत में पुलिस की शक्ति
लेखक: खुर्शीद अहमद सिद्दीकी (गुलाम-ए-मुस्तफ़ा)
लोकतंत्र की पहचान केवल चुनावों के आयोजन या जनता द्वारा चुनी गई सरकार के अस्तित्व से नहीं होती। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इस बात में निहित होती है कि वहाँ नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की कितनी रक्षा होती है, सत्ता से सवाल पूछने की कितनी स्वतंत्रता है, संवैधानिक संस्थाएँ कितनी निष्पक्ष हैं और सरकार शांतिपूर्ण असहमति को किस सीमा तक स्वीकार करती है।
10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित विरोध-प्रदर्शन के संबंध में हुई घटनाओं ने एक बार फिर एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया है: लोकतंत्र में पुलिस को कितनी शक्ति प्राप्त होनी चाहिए और उस शक्ति की सीमाएँ कहाँ तक होनी चाहिए?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी और प्रदर्शन स्थल तक पहुँचने का प्रयास करने वाले बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया। पुलिस की ओर से प्रक्रिया संबंधी कमियों और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं का हवाला दिया गया, जबकि प्रदर्शनकारी अपनी माँगों को सार्वजनिक रूप से उठाना चाहते थे। व्यापक सुरक्षा व्यवस्था और बड़े पैमाने पर हुई हिरासतों ने यह सवाल पैदा किया कि क्या कम प्रतिबंधात्मक उपायों से भी प्रशासन अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता था।
विरोध-प्रदर्शन का संवैधानिक अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर संविधान के अंतर्गत कानून द्वारा उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
ये अधिकार किसी लोकतांत्रिक भारत में पुलिस की शक्ति
असहमति का अधिकार, लोक-व्यवस्था का अर्थ और संवैधानिक लोकतंत्र की कसौटी
लेखक: खुर्शीद अहमद सिद्दीकी (गुलाम-ए-मुस्तफ़ा)
लोकतंत्र की पहचान केवल चुनावों के आयोजन या जनता द्वारा चुनी गई सरकार के अस्तित्व से नहीं होती। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इस बात में निहित होती है कि वहाँ नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की कितनी रक्षा होती है, सत्ता से सवाल पूछने की कितनी स्वतंत्रता है, संवैधानिक संस्थाएँ कितनी निष्पक्ष हैं और सरकार शांतिपूर्ण असहमति को किस सीमा तक स्वीकार करती है।
10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित विरोध-प्रदर्शन के संबंध में हुई घटनाओं ने एक बार फिर एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया है: लोकतंत्र में पुलिस को कितनी शक्ति प्राप्त होनी चाहिए और उस शक्ति की सीमाएँ कहाँ तक होनी चाहिए?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी और प्रदर्शन स्थल तक पहुँचने का प्रयास करने वाले बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया। पुलिस की ओर से प्रक्रिया संबंधी कमियों और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं का हवाला दिया गया, जबकि प्रदर्शनकारी अपनी माँगों को सार्वजनिक रूप से उठाना चाहते थे। व्यापक सुरक्षा व्यवस्था और बड़े पैमाने पर हुई हिरासतों ने यह सवाल पैदा किया कि क्या कम प्रतिबंधात्मक उपायों से भी प्रशासन अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता था।
विरोध-प्रदर्शन का संवैधानिक अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर संविधान के अंतर्गत कानून द्वारा उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
ये अधिकार किसी सत्तारूढ़ दल या प्रशासन की कृपा से प्राप्त सुविधाएँ नहीं हैं। ये नागरिकों के मौलिक अधिकार हैं। शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन जनता को अपनी समस्याएँ व्यक्त करने, सरकार से जवाबदेही माँगने और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का अवसर प्रदान करता है।
हालाँकि, इन अधिकारों का प्रयोग कानून और संविधान के दायरे में होना चाहिए। राज्य को लोक-व्यवस्था तथा संविधान में मान्य अन्य आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाने का अधिकार है। लेकिन असली संवैधानिक प्रश्न यह है कि कोई प्रतिबंध कानूनी, आवश्यक, आनुपातिक और निष्पक्ष है या नहीं।
यदि किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार किया जाता है, तो प्रशासन को उसके कारण स्पष्ट रूप से बताने चाहिए। उसे यह भी विचार करना चाहिए कि क्या किसी वैकल्पिक स्थान, निर्धारित समय-सीमा, सीमित संख्या में प्रतिभागियों और उचित सुरक्षा प्रबंधों के माध्यम से संभावित समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।
आखिर ‘लोक-व्यवस्था’ क्या है?
‘लोक-व्यवस्था’ अर्थात Public Order का उल्लेख अक्सर धरना-प्रदर्शन पर रोक लगाने, लोगों को हिरासत में लेने और पुलिस बल की व्यापक तैनाती को उचित ठहराने के लिए किया जाता है।
निस्संदेह, कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। लेकिन लोक-व्यवस्था की अवधारणा को सरकार की आलोचना दबाने या असुविधाजनक सवालों को खामोश करने का असीमित अधिकार नहीं बनाया जा सकता।
हिंसा को रोकने और असहमति की आवाज़ को रोकने में मूलभूत अंतर है। कोई शांतिपूर्ण प्रदर्शन सरकार की आलोचना कर सकता है, किसी सार्वजनिक पदाधिकारी के इस्तीफे की माँग कर सकता है या संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठा सकता है। केवल इस कारण कि किसी माँग से सरकार असहज है, उसे लोक-व्यवस्था के लिए खतरा नहीं माना जाना चाहिए।
प्रशासन को वास्तविक और विश्वसनीय जोखिमों का आकलन करना चाहिए। यह मान लेना उचित नहीं कि प्रत्येक प्रदर्शन अनिवार्य रूप से हिंसा या अव्यवस्था में बदल जाएगा। प्रतिबंधों का आधार वास्तविक परिस्थितियाँ होनी चाहिए, न कि प्रदर्शन की राजनीतिक संवेदनशीलता।
पुलिस का दायित्व कानून लागू करना है, यह तय करना नहीं कि नागरिक कौन-सी राय व्यक्त कर सकते हैं। पुलिस की शक्ति संविधान, कानून और न्यायिक निगरानी की सीमाओं के भीतर ही वैध है।
क्या दिल्ली की स्थिति को दूसरे तरीके से संभाला जा सकता था?
10 अक्टूबर की घटनाएँ एक उचित प्रश्न उठाती हैं: क्या प्रशासन स्पष्ट शर्तों के साथ कुछ सौ लोगों को जंतर-मंतर पर शांतिपूर्वक एकत्र होने की अनुमति दे सकता था?
यदि उचित सुरक्षा, भीड़-प्रबंधन, समय-सीमा और कानूनी निर्देशों के माध्यम से संभावित जोखिमों को नियंत्रित किया जा सकता था, तो ऐसा प्रबंध विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था—दोनों की रक्षा कर सकता था।
इसके विपरीत, बड़े पैमाने पर हिरासतों और प्रतिबंधों की रिपोर्टों ने प्रशासनिक कार्रवाई की आवश्यकता, आनुपातिकता, सरकारी खर्च और आम नागरिकों को हुई असुविधा पर सवाल खड़े किए हैं।
पुलिस की प्रत्येक कार्रवाई की वैधता का निर्णय संबंधित साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर होना चाहिए। लेकिन एक व्यापक सिद्धांत स्पष्ट है: केवल विरोध-प्रदर्शन करने की मंशा को अपराध मानकर निवारक कार्रवाई को दंड का रूप नहीं दिया जाना चाहिए।
सरकार और पुलिस को हिंसा, यातायात में बाधा या वैध निर्देशों की अवहेलना को लेकर वास्तविक चिंताएँ हो सकती हैं। इन चिंताओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लेकिन प्रशासन को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि अपनाए गए कठोर उपाय क्यों आवश्यक थे और क्या कम प्रतिबंधात्मक विकल्प पर्याप्त नहीं हो सकते थे।
आम जनता को इसकी कीमत क्यों चुकानी पड़े?
जब किसी बड़े विरोध-प्रदर्शन को रोकने के लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की जाती है, तो उसका प्रभाव केवल प्रदर्शनकारियों और प्रशासन तक सीमित नहीं रहता। यात्रियों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों, मरीजों, व्यापारियों और आम नागरिकों को आवागमन में कठिनाइयों, देरी और दैनिक जीवन में व्यवधान का सामना करना पड़ सकता है।
यह जनहित से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न है: यदि उचित नियमों के अंतर्गत शांतिपूर्ण सभा आयोजित की जा सकती है, तो ऐसी व्यवस्था को सुगम बनाना अधिक विवेकपूर्ण नहीं होगा, बजाय इसके कि प्रदर्शनकारी, पुलिसकर्मी और आम नागरिक सभी अनावश्यक परेशानियों और खर्चों का बोझ उठाएँ?
सरकारी धन का उपयोग नागरिकों की सुरक्षा, आवश्यक सेवाओं और कानूनसम्मत व्यवस्था बनाए रखने के लिए किया जाना चाहिए। जब असाधारण पुलिस तैनाती, यातायात प्रतिबंध या बड़े पैमाने पर हिरासतें आवश्यक बताई जाती हैं, तो जनता को उनके औचित्य की जानकारी मिलने का भी अधिकार है।
सहारनपुर न्यायालय परिसर में मस्जिद का ध्वस्तीकरण: न्यायिक प्रक्रिया का महत्व
एक अन्य गंभीर चिंता सहारनपुर न्यायालय परिसर में स्थित एक मस्जिद के कथित ध्वस्तीकरण को लेकर सामने आती है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, यह कार्रवाई पुलिस बल की तैनाती और प्रशासनिक प्रतिबंधों के बीच की गई, जबकि संबंधित अपील की कार्यवाही पूरी होने की प्रतीक्षा नहीं की गई।
हालाँकि, इस मामले में संपत्ति की कानूनी स्थिति, लागू प्रशासनिक एवं न्यायिक आदेशों, ध्वस्तीकरण की परिस्थितियों और अपील की वास्तविक स्थिति की पुष्टि आधिकारिक अभिलेखों से की जानी चाहिए।
फिर भी, यह मामला एक महत्वपूर्ण सिद्धांत की याद दिलाता है, जो धार्मिक स्थलों, निजी संपत्तियों और सार्वजनिक भवनों—सभी पर समान रूप से लागू होता है: कार्यपालिका की शक्ति कानून के अधीन है और न्यायिक प्रक्रिया को प्रशासनिक असुविधा समझकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
यदि किसी मामले में अपील या अंतरिम राहत की याचिका लंबित है, तो उसके कानूनी प्रभाव का निर्धारण संबंधित कानून और न्यायालय के आदेशों के आधार पर होगा। केवल अपील दाखिल कर देने से प्रत्येक कार्रवाई अपने-आप स्थगित नहीं हो जाती। दूसरी ओर, यदि किसी सक्षम न्यायालय का स्थगनादेश, निषेधाज्ञा या अन्य बाध्यकारी आदेश प्रभावी है, तो प्रशासन उसका उल्लंघन नहीं कर सकता।
उचित मार्ग यही है कि कानूनी स्थिति स्पष्ट की जाए, न्यायालयों के अधिकार का सम्मान किया जाए और किसी भी ध्वस्तीकरण या बलपूर्वक कार्रवाई को वैध अधिकार तथा निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप ही अंजाम दिया जाए।
संवैधानिक लोकतंत्र में किसी नागरिक को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा उसकी धार्मिक पहचान, राजनीतिक विचारधारा या सार्वजनिक दबाव से निर्धारित नहीं होनी चाहिए। कानून, निष्पक्षता और जवाबदेही के समान मानक सभी पर लागू होने चाहिए।
बुलडोज़र कार्रवाई और कानून का शासन
प्रशासनिक कार्रवाई के माध्यम से शीघ्र ध्वस्तीकरण की घटनाओं ने कार्यपालिका की शक्ति, संपत्ति के अधिकार और न्यायिक उपचार की उपलब्धता पर व्यापक बहस को जन्म दिया है।
सरकार न्यायिक प्रक्रिया का स्थान किसी प्रशासनिक शॉर्टकट को नहीं दे सकती। जहाँ कानून नोटिस, सुनवाई, कारणयुक्त आदेश या न्यायिक संरक्षण प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है, वहाँ इन प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन आवश्यक है।
सर्वोच्च न्यायालय ने दंडात्मक ध्वस्तीकरण के मामलों में उचित प्रक्रिया के महत्व पर बल दिया है। साथ ही, कानून के अनुसार अनधिकृत निर्माणों को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत हटाने की कार्रवाई भी संभव है।
मुख्य अंतर वैध प्रशासनिक कार्रवाई और आवश्यक कानूनी सुरक्षा उपायों की अनदेखी करके दंड देने के उद्देश्य से की गई मनमानी कार्रवाई के बीच है।
कानून का शासन यही कहता है कि न तो कोई सामान्य नागरिक और न ही कोई शक्तिशाली सरकारी संस्था कानून से ऊपर है।
पुलिस की शक्ति के साथ जवाबदेही भी आवश्यक
पुलिस समाज की एक आवश्यक सार्वजनिक संस्था है। वह जीवन और संपत्ति की रक्षा करती है, अपराधों की जाँच करती है, हिंसा रोकती है और कानून-व्यवस्था बनाए रखती है। लोकतांत्रिक समाज को सक्षम और प्रभावी पुलिस व्यवस्था की आवश्यकता है।
लेकिन प्रभावशीलता का अर्थ असीमित अधिकार नहीं है। पुलिस की शक्ति तभी वैध है, जब उसका प्रयोग कानून के अनुसार, उचित तरीके से और जवाबदेही के साथ किया जाए।
जहाँ अत्यधिक बल प्रयोग, मनमानी हिरासत या गैरकानूनी प्रतिबंधों के आरोप सामने आते हैं, वहाँ निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। हिरासत के आधार का स्पष्ट रिकॉर्ड, गिरफ्तारी संबंधी कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन, न्यायिक उपचार तक पहुँच और कथित पुलिस दुर्व्यवहार की उचित जाँच सुनिश्चित की जानी चाहिए।
जवाबदेही पुलिस को कमजोर नहीं करती। इसके विपरीत, वह जनता का विश्वास मजबूत करती है और संवैधानिक अधिकार के प्रयोग को मनमानी शक्ति से अलग करती है।
लोकतंत्र या निरंकुशता: प्रत्येक नागरिक के सामने एक प्रश्न
क्या भारत लोकतंत्र है या निरंकुश शासन की ओर बढ़ रहा है? इस प्रश्न का उत्तर किसी एक घटना के आधार पर अंतिम रूप से निर्धारित करना उचित नहीं होगा। भारत में संवैधानिक व्यवस्था, निर्वाचित सरकारें, न्यायालय और कानून द्वारा मान्य मौलिक अधिकार मौजूद हैं। वास्तविक प्रश्न यह है कि जब नागरिक सत्ता से असहमति व्यक्त करते हैं, तब ये संस्थाएँ और अधिकार व्यवहार में कितने प्रभावी रहते हैं।
लोकतंत्र की परीक्षा तब नहीं होती जब नागरिक सरकार की प्रशंसा करते हैं, बल्कि तब होती है जब वे उसकी आलोचना करते हैं। लोकतंत्र की कसौटी केवल संवैधानिक प्रावधानों का अस्तित्व नहीं, बल्कि यह भी है कि नागरिक वास्तव में अपने अधिकारों का उपयोग कर पाते हैं या नहीं।
यह भी देखना होगा कि पुलिस शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और आम जनता—दोनों की सुरक्षा करती है या नहीं, और क्या सरकारी संस्थाएँ असुविधाजनक परिस्थितियों में भी न्यायालयों के आदेशों का पालन करती हैं।
सरकार का दायित्व लोक-व्यवस्था बनाए रखना है। प्रदर्शनकारियों का दायित्व शांतिपूर्ण रहना और वैध प्रतिबंधों का पालन करना है। पुलिस का दायित्व निष्पक्षता से कानून लागू करना है। न्यायालयों का दायित्व संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना और सरकारी कार्रवाई की वैधता की जाँच करना है।
इनमें से किसी एक का दायित्व दूसरे के अधिकारों को समाप्त नहीं करता।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि राज्य के पास शक्ति है या नहीं, बल्कि यह है कि उस शक्ति का प्रयोग संवैधानिक सीमाओं के भीतर किया जा रहा है या नहीं। अपनी लोकतांत्रिक वैधता पर विश्वास रखने वाली सरकार को आलोचना सुनने, शांतिपूर्ण विरोध के लिए कानूनी रास्ते उपलब्ध कराने और प्रतिबंधात्मक कार्रवाइयों को पारदर्शी कारणों तथा साक्ष्यों के आधार पर उचित ठहराने के लिए तैयार रहना चाहिए।
लोकतंत्र प्रत्येक असहमत आवाज़ को खामोश करके मजबूत नहीं होता। वह तब मजबूत होता है, जब असहमति शांतिपूर्वक व्यक्त की जा सके, लोक-व्यवस्था निष्पक्षता से बनाए रखी जाए और शक्तिशाली लोगों पर भी वही कानून लागू हो जो आम नागरिकों पर लागू होता है।
,”संविधान केवल सरकार को अधिकार प्रदान करने वाला दस्तावेज़ नहीं है”। वह उन अधिकारों के मनमाने इस्तेमाल से नागरिकों की रक्षा करने वाला सुरक्षा-कवच भी है।
इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि भारत लोकतंत्र है या निरंकुशता की ओर बढ़ रहा है। असली प्रश्न यह है कि क्या भारतीय राज्य की प्रत्येक संस्था उन संवैधानिक वादों को निभाने के लिए तैयार है, जिनसे लोकतंत्र को वास्तविक अर्थ और गरिमा प्राप्त होती है।
खुर्शीद अहमद सिद्दीकी (गुलाम-ए-मुस्तफ़ा)





