नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में CJP यानी कॉकरोच जनता पार्टी के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। प्रदर्शन से पहले दिल्ली में बड़े पैमाने पर पुलिस तैनाती, मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदियां, इंटरनेट सेवाओं पर रोक और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने के मामले ने नया मोड़ ले लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक परिवहन पर व्यापक प्रतिबंधों को लेकर सवाल उठाए और अधिकारियों को मेट्रो सेवाएं पूरी तरह बंद नहीं करने तथा उन्हें सामान्य रूप से संचालित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए।
मामले में अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई भी बड़ी खबर है। तीनों को दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए पहुंचने के बाद पुलिस ने हिरासत में लिया था। करीब 23 से 24 घंटे बाद तीनों को कार्यकारी मजिस्ट्रेट के आदेश पर रिहा कर दिया गया। हालांकि, उनकी रिहाई कुछ शर्तों के साथ हुई है।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट का रुख
दिल्ली में 10 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन को रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई थी। इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने और प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोके जाने के आरोप सामने आए। इसके बाद पुलिस की कार्रवाई और सार्वजनिक परिवहन पर लगाए गए प्रतिबंधों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गईं।
11 अक्टूबर को इन मामलों पर सुप्रीम कोर्ट में विशेष सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान लोगों को हिरासत में लिया गया और सार्वजनिक परिवहन पर प्रतिबंधों के कारण आम नागरिकों को भी परेशानी उठानी पड़ी।
अदालत के सामने यह सवाल भी उठा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाए गए कदम कहीं जरूरत से ज्यादा व्यापक तो नहीं थे। शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार और आम नागरिकों की आवाजाही—दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया गया।
मेट्रो सेवाओं पर प्रतिबंध को लेकर पहले भी जताई थी चिंता
प्रदर्शन से पहले दिल्ली के 57 मेट्रो स्टेशनों को बंद करने की योजना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को ही चिंता जताई थी। अदालत ने स्पष्ट किया था कि सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर मेट्रो और रेलवे सेवाओं को पूरी तरह रोकना उचित नहीं होगा।
इसके बाद अधिकारियों से सार्वजनिक परिवहन को नियंत्रित तरीके से संचालित करने और आम लोगों को अनावश्यक परेशानी से बचाने के लिए कदम उठाने को कहा गया। 11 अक्टूबर को सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक, अदालत ने मेट्रो सेवाओं पर लगाए गए प्रतिबंध हटाने और सामान्य परिचालन बहाल करने के निर्देश दिए।
इस घटनाक्रम का असर केवल प्रदर्शनकारियों तक सीमित नहीं था। दिल्ली में नौकरी करने वाले लोगों, छात्रों, यात्रियों और दूसरे शहरों से आने-जाने वाले नागरिकों के लिए भी परिवहन सेवाएं महत्वपूर्ण थीं। यही वजह है कि अदालत में सार्वजनिक सुविधा और सुरक्षा के बीच संतुलन का मुद्दा प्रमुखता से उठा।
इंटरनेट सेवाओं पर रोक का मामला भी अदालत पहुंचा
प्रदर्शन के मद्देनजर मध्य दिल्ली के कुछ हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं भी निलंबित की गई थीं। इस फैसले को लेकर भी सवाल उठाए गए। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में इंटरनेट सेवाओं को निलंबित करने के आदेश और उसके पीछे दिए गए कारणों की न्यायिक समीक्षा की मांग की गई।
याचिका में यह जांचने की मांग की गई कि प्रतिबंध लागू करने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया था या नहीं। इंटरनेट बंद होने से सूचना के आदान-प्रदान और आम लोगों के दैनिक कामकाज पर पड़ने वाले प्रभाव का मुद्दा भी उठाया गया।
रिपोर्टों में इंटरनेट सेवाएं बहाल करने के निर्देश की जानकारी सामने आई है। हालांकि, प्रतिबंध किन क्षेत्रों में और किस समय तक लागू था, इस बारे में अंतिम स्थिति संबंधित आधिकारिक आदेश से स्पष्ट की जानी चाहिए।
23 से 24 घंटे बाद रिहा हुए CJP के तीन नेता
इस पूरे मामले में कॉकरोच जनता पार्टी के तीन नेताओं—अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका—की रिहाई भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।
दिल्ली पुलिस ने 10 अक्टूबर को मुंबई से दिल्ली पहुंची फ्लाइट के उतरने के बाद तीनों को हिरासत में लिया था। पुलिस ने उनके खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 170 के तहत निवारक कार्रवाई की थी। इसके बाद उन्हें दिल्ली कैंट के कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया।
11 अक्टूबर को कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने तीनों को रिहा करने का आदेश दिया। रिपोर्टों के अनुसार, उनकी रिहाई के लिए 50 हजार रुपये का जमानती मुचलका और अगले एक वर्ष तक शांति एवं सद्भाव बनाए रखने की शर्त रखी गई।
इस तरह करीब एक दिन हिरासत में रहने के बाद तीनों नेताओं को रिहाई मिली। हालांकि, यह रिहाई बिना शर्त नहीं थी। पुलिस की कार्रवाई और रिहाई की परिस्थितियों को लेकर संबंधित पक्षों के बयान सामने आने के बाद मामले के अन्य पहलुओं पर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
आखिर क्यों हो रहा था दिल्ली में प्रदर्शन?
CJP और प्रदर्शन से जुड़े लोगों का मुख्य मुद्दा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवाल हैं।
प्रदर्शन से जुड़े पक्षों ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाया और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की। विपक्षी दलों की ओर से भी मतदाता सूची के पुनरीक्षण और मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
दूसरी ओर, प्रशासन ने प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संभावित अव्यवस्था को रोकने के लिए सुरक्षा संबंधी कदम उठाए। प्रदर्शन की अनुमति और उससे जुड़ी शर्तों को लेकर भी विवाद सामने आया।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं से जुड़े आरोपों को स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। इन दावों की पुष्टि संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड और जांच के आधार पर ही की जा सकती है।
अब आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के बाद अब नजर इस बात पर है कि सार्वजनिक परिवहन और इंटरनेट सेवाओं से जुड़े निर्देशों का पालन किस तरह किया जाता है और हिरासत में लिए गए लोगों के संबंध में उठाए गए सवालों पर प्रशासन क्या जवाब देता है।
अदालत ने मेट्रो सेवाओं पर व्यापक प्रतिबंधों को लेकर चिंता जताई है और अधिकारियों से सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह ठप नहीं करने की दिशा में कदम उठाने को कहा है। वहीं, प्रदर्शनकारियों की हिरासत को लेकर दाखिल याचिकाओं में उठाए गए आरोपों पर कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
दिल्ली का यह घटनाक्रम एक बार फिर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार, कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी और आम नागरिकों की सुविधाओं के बीच संतुलन के सवाल को सामने लाता है। अब आगे की स्थिति संबंधित अधिकारियों के जवाब, अदालत के आदेशों और उनके अनुपालन पर निर्भर करेगी।






