हल्ला बोल! हल्ला बोल!
SIR पर सियासत या तथ्यों पर बात?
हर तरफ़ विरोध-प्रदर्शन है, मगर सच्चाई और तथ्यों पर चर्चा कितनी हो रही है?
SIR यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर आजकल राजनीतिक बयानबाज़ी और विरोध-प्रदर्शनों का दौर जारी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस मुद्दे पर जनता के सामने पूरी वस्तुस्थिति रखी जा रही है, या फिर इसे भी सियासी अखाड़ा बनाकर अपनी-अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश हो रही है?
ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त बने रहें या चले जाएँ, यह राजनीतिक बहस का विषय हो सकता है। लेकिन उससे पहले यह सवाल उठना चाहिए कि जिन राजनीतिक दलों और संगठनों को मतदाताओं के अधिकारों की इतनी चिंता है, उन्होंने SIR की प्रक्रिया के दौरान समय रहते कितनी तैयारी की? क्या उनके पास प्रत्येक बूथ के स्तर पर अनुपस्थित, स्थायी रूप से स्थानांतरित और मृत मतदाताओं से संबंधित आँकड़े हैं? क्या उन्होंने मतदाता सूची की जाँच करके वास्तविक समस्याओं की पहचान की? यदि नहीं, तो केवल नारेबाज़ी से समस्या का समाधान कैसे होगा?
उत्तराखंड की परिस्थितियों को भी तथ्यों के आधार पर समझना आवश्यक है। इसे असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की परिस्थितियों के समान मानकर एक ही चश्मे से नहीं देखा जा सकता। हर राज्य की सामाजिक, भौगोलिक और जनसांख्यिकीय परिस्थितियाँ अलग होती हैं।
बांग्लादेशी नागरिकों की मौजूदगी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी बिना प्रमाण के दावे करने के बजाय आधिकारिक आँकड़ों और सत्यापित तथ्यों के आधार पर बात होनी चाहिए।
इसी तरह, उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के संबंध में भी यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि किसी व्यक्ति का नाम किस निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज है। एक व्यक्ति का नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज नहीं होना चाहिए। किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से कटे नहीं और किसी अपात्र या दोहराव वाली प्रविष्टि को नियमों के विरुद्ध बनाए भी न रखा जाए।
चुनाव प्रक्रिया में इन दोनों बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।
लोकतंत्र केवल विरोध करने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाने का भी नाम है।
यदि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से हटाया गया है, तो उसकी आवाज़ उठनी चाहिए। यदि किसी की प्रविष्टि में त्रुटि है, तो उसे सुधारा जाना चाहिए। यदि चुनाव आयोग की प्रक्रिया में कोई कमी है, तो प्रमाणों के साथ सवाल पूछे जाने चाहिए। लेकिन बिना पूरी जानकारी जुटाए केवल राजनीतिक नारे लगाना जनता को समाधान नहीं देता।
आज ज़रूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और चुनाव आयोग—सभी तथ्यों, पारदर्शिता और जवाबदेही के आधार पर काम करें। जनता को यह बताया जाए कि कितने नाम हटाए गए, किन कारणों से हटाए गए, कितने पात्र मतदाताओं के नाम छूटे और शिकायतों के निस्तारण की क्या व्यवस्था है। इन आँकड़ों की पुष्टि के लिए भारत निर्वाचन आयोग और संबंधित राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइटों पर प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची, दावे-आपत्तियों के आँकड़े, हटाए गए नामों के कारणों तथा अपील और शिकायत-निवारण की आधिकारिक जानकारी देखी जानी चाहिए। उपलब्ध आधिकारिक आँकड़े न होने पर किसी संख्या या निष्कर्ष को निश्चित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
हर तरफ़ प्रोटेस्ट ही प्रोटेस्ट है, मगर सच्चाई कौन बताएगा?
राजनीति का अखाड़ा बनाने के बजाय इस मुद्दे को नागरिकों के अधिकारों और निष्पक्ष चुनाव की कसौटी पर परखना चाहिए।
क्योंकि मतदाता सूची किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद है।
नारे लगाने से पहले तथ्य जुटाइए, आरोप लगाने से पहले प्रमाण दीजिए और राजनीति करने से पहले जनता के अधिकारों की चिंता कीजिए।
खुर्शीद अहमद सिद्दीकी
ग़ुलाम-ए-मुस्तफ़ा






