14 जिला उपाध्यक्ष और विधानसभा स्तर पर अलग अध्यक्ष; पदों की बढ़ती संख्या के बीच जिम्मेदारी, अधिकार और जवाबदेही पर उठ रहे सवाल
बरेली। मिशन-2027 से पहले समाजवादी पार्टी के बरेली जिलाध्यक्ष शुभलेश यादव ने संगठन का विस्तार करते हुए बड़ी टीम तैयार की है। 65 सदस्यीय जिला कार्यकारिणी में 14 जिला उपाध्यक्ष बनाए गए हैं, वहीं विधानसभा स्तर पर अलग-अलग अध्यक्ष संगठन संभाल रहे हैं। ब्लॉक स्तर पर भी अलग नेतृत्व मौजूद है।
ऐसे में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को लेकर एक सीधा सवाल चर्चा में है—जब विधानसभा अध्यक्ष अपने पूरे विधानसभा क्षेत्र की जिम्मेदारी संभाल रहा है तो 14 जिला उपाध्यक्षों की अलग-अलग भूमिका आखिर क्या है?
14 जिला उपाध्यक्षों की ‘फौज’, क्या हर पद के साथ उतना ही काम?
नई जिला कार्यकारिणी में 14 जिला उपाध्यक्ष होना संगठन के बड़े विस्तार को दिखाता है। लेकिन पदों की संख्या बढ़ने के साथ उनकी जिम्मेदारी स्पष्ट होना भी जरूरी है।
पार्टी की ओर से उपाध्यक्षों को अलग-अलग जोन और बूथ गठन से संबंधित जिम्मेदारियां दिए जाने की व्यवस्था सामने आई है। अब सवाल यह है कि इन जिम्मेदारियों का जमीनी मूल्यांकन कैसे होगा?
किस उपाध्यक्ष के पास कितने बूथ हैं, उसके क्षेत्र में कितनी बैठकें हुईं और उसने संगठन को कितना सक्रिय किया—यदि इन आधारों पर समीक्षा होती है तो बड़ी टीम संगठनात्मक ताकत बन सकती है।
विधानसभा अध्यक्ष का अपना पूरा क्षेत्र, फिर जिला उपाध्यक्ष की भूमिका क्या?
यह नई संगठनात्मक संरचना का सबसे दिलचस्प सवाल है।
विधानसभा अध्यक्ष अपने विधानसभा क्षेत्र का अध्यक्ष है। उसे क्षेत्र में पार्टी को सक्रिय करने, कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय और बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने की जिम्मेदारी दी जाती है।
इसके बावजूद जिला उपाध्यक्ष और विधानसभा प्रभारी भी संगठनात्मक व्यवस्था का हिस्सा हैं।
ऐसे में कार्यकर्ताओं के बीच यह स्पष्ट होना जरूरी है कि विधानसभा अध्यक्ष और जिला उपाध्यक्ष में संगठनात्मक अधिकार किस स्तर पर अलग होते हैं?
अगर किसी विधानसभा में संगठनात्मक विवाद होता है तो फैसला कौन करेगा? विधानसभा अध्यक्ष सीधे जिलाध्यक्ष को रिपोर्ट करेगा या संबंधित जिला पदाधिकारी के माध्यम से? जिला उपाध्यक्ष का काम विधानसभा अध्यक्ष की मदद करना है या उसकी गतिविधियों की समीक्षा करना?
इन सवालों की स्पष्टता संगठन के बेहतर संचालन के लिए महत्वपूर्ण है।
विधानसभा अध्यक्ष बनाम जिला उपाध्यक्ष—बड़ा पद कौन सा, जिम्मेदारी किसकी ज्यादा?
संगठन में केवल पदनाम देखकर किसी पद का प्रभाव तय नहीं किया जा सकता। दोनों की जिम्मेदारियां अलग-अलग हो सकती हैं।
लेकिन जमीनी कार्यकर्ता के नजरिए से सवाल महत्वपूर्ण है—एक तरफ पूरे विधानसभा क्षेत्र का अध्यक्ष और दूसरी तरफ जिले का उपाध्यक्ष, संगठनात्मक व्यवस्था में दोनों की भूमिका और अधिकारों की सीमा क्या है?
अगर जिम्मेदारियां स्पष्ट नहीं हुईं तो पदों की बड़ी संख्या कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा कर सकती है।
पद बढ़े हैं तो जवाबदेही भी बढ़नी चाहिए
बड़ी कार्यकारिणी का फायदा तभी है जब अधिक पदाधिकारियों के जरिए संगठन ज्यादा सक्रिय हो।
14 उपाध्यक्ष हैं तो 14 अलग जिम्मेदारियों और उनके परिणाम भी दिखाई देने चाहिए। विधानसभा अध्यक्ष हैं तो उनके क्षेत्रों में बूथ और सेक्टर स्तर पर संगठन की सक्रियता भी नजर आनी चाहिए।
सिर्फ पदों की लंबी सूची संगठन की मजबूती नहीं बताती। असली पैमाना यह होगा कि जमीन पर कौन कितना काम करता है।
शुभलेश यादव ने टीम तो बड़ी बनाई, अब उसे चलाने की चुनौती
जिलाध्यक्ष शुभलेश यादव के सामने अब सबसे महत्वपूर्ण चुनौती अलग-अलग स्तर के पदाधिकारियों के बीच तालमेल बनाने की है।
जिला उपाध्यक्ष, विधानसभा अध्यक्ष, ब्लॉक अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारी अगर स्पष्ट जिम्मेदारियों के साथ काम करते हैं तो बड़ा संगठन चुनावी तैयारियों में उपयोगी साबित हो सकता है।
लेकिन यदि जिम्मेदारियों की सीमा स्पष्ट नहीं रही तो एक ही क्षेत्र में कई पदाधिकारियों की मौजूदगी से संगठनात्मक टकराव या भ्रम की स्थिति भी पैदा हो सकती है।
सवाल पद बांटने का नहीं, काम दिखाने का है
2027 से पहले बरेली सपा की नई टीम के सामने कई संगठनात्मक सवाल हैं—
14 जिला उपाध्यक्षों में किसके पास कौन-सी जिम्मेदारी है?
विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार और जिला उपाध्यक्ष की भूमिका में अंतर क्या है?
दोनों में संगठनात्मक समन्वय किस तरह होगा?
इतनी बड़ी टीम के काम की समीक्षा किस आधार पर होगी?
नई टीम की वास्तविक परीक्षा इन्हीं सवालों के जवाब जमीन पर देने में होगी।
फिलहाल शुभलेश यादव की टीम में उपाध्यक्षों की ‘फौज’ है और विधानसभा स्तर पर अलग अध्यक्ष हैं—अब 2027 से पहले देखना यह है कि पदों की यह बड़ी संख्या संगठन के जमीनी काम और जवाबदेही में कितनी बदलती है।






