बेटी के जन्म पर आज भी कई जगह सवाल उठते हैं… लेकिन एक पिता ऐसा भी है, जिसने अपनी बेटी के जन्म को भगवान का सबसे सुंदर वरदान मान लिया। जिसने अपनी नन्ही परी की मुस्कान के लिए दुनिया की सबसे कठिन राह भी चुन ली।
मुझे मंज़ूर था कि एक साधारण मजदूर पिता ने अपनी नन्ही बेटी के लिए ऐसा प्यार और समर्पण दिखाया, जिसने हर किसी का दिल छू लिया।
दिन-रात पसीना बहाकर रोजी-रोटी कमाने वाले इस पिता ने बेटी की खुशियों के लिए अपनी हैसियत से बढ़कर करीब डेढ़ लाख रुपये जुटाए। जब बाबा बैद्यनाथ से मांगी गई मन्नत पूरी हुई, तो इस पिता ने अपनी दो महीने की मासूम बच्ची को फूलों से सजी खूबसूरत डोली में बिठाया और खुद अपने हाथों से उसे खींचते और दंडवत देते हुए सुल्तानगंज से बाबाधाम देवघर तक,105 किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा कर देवघर पहुंचा।
तेज धूप… उमस… थकान… और पसीने से तर-बतर शरीर…
लेकिन बेटी के चेहरे पर मुस्कान देखकर इस पिता के कदम कभी नहीं डगमगाए। बिटिया के पैरों को धूप न लगे, इसलिए उसने अपनी सारी तकलीफें अपने सीने में छिपा लीं।
जिसने भी इस पिता और बेटी के प्रेम का यह अद्भुत नजारा देखा, उसकी आंखें नम हो गईं।
यह सिर्फ आस्था की यात्रा नहीं थी… यह एक पिता के अटूट प्रेम की मिसाल थी।
यह संदेश था उन लोगों के लिए, जो आज भी बेटियों को बोझ समझते हैं।
बेटियां बोझ नहीं होतीं… वे पिता का अभिमान होती हैं, मां की मुस्कान होती हैं और घर की साक्षात लक्ष्मी होती हैं।
और इस जांबाज़ पिता ने दुनिया को यह बता दिया कि—
जिस घर में बेटी होती है, वहां खुशियों का खजाना होता है।
एक पिता का यह निस्वार्थ प्रेम… और बेटी के लिए किया गया यह अद्भुत समर्पण… यकीनन हर दिल पर अमिट छाप छोड़ जाएगा। मनोरंजन प्रसाद, ब्यूरो चीफ, बांका






