नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के गैंगस्टर एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अहम फैसला सुनाते हुए कानून के प्रावधानों पर गंभीर सवाल उठाए। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि मौजूदा स्वरूप में यह कानून किसी व्यक्ति को केवल “गैंगस्टर” के रूप में चिन्हित किए जाने के आधार पर दंडित करने की स्थिति पैदा करता है।
कोर्ट ने कहा कि कानून में गैंग और गैंगस्टर की परिभाषा तो दी गई है, लेकिन गैंगस्टर होने को अपने आप में अलग अपराध के रूप में स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं किया गया। इसी आधार पर अदालत ने इसे “स्टिलबॉर्न” यानी ऐसा कानून बताया, जो मौजूदा प्रावधानों के आधार पर दंडात्मक कार्रवाई को टिकाऊ बनाने में सक्षम नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि कानून के तहत तैयार होने वाला गैंग चार्ट किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई का आधार बन सकता है, जबकि संबंधित अपराधों के लिए पहले से ही अलग-अलग कानून मौजूद हैं। अदालत के मुताबिक इससे कार्यपालिका को किसी व्यक्ति की गैंगस्टर के रूप में पहचान तय करने में अत्यधिक और अनियंत्रित अधिकार मिलने का खतरा है।
पीठ ने साफ किया कि केवल किसी व्यक्ति को गैंगस्टर के तौर पर नामित कर देना उसके खिलाफ आपराधिक सजा का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। अदालत ने यह भी कहा कि नियमों के जरिए ऐसा अपराध नहीं बनाया जा सकता, जिसे मूल कानून ने स्वयं अपराध के रूप में स्थापित नहीं किया है।
मामले में अदालत ने दो अधिवक्ताओं के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से उत्तर प्रदेश में गैंगस्टर एक्ट के इस्तेमाल और इसके तहत होने वाली कार्रवाई को लेकर नई कानूनी बहस शुरू हो गई है।






