महामहिम राष्ट्रपति जी,
भारत सरकार,
नई दिल्ली।
महोदया,
आपके विचारार्थ एवं उचित कार्रवाई के लिए यह लेख प्रस्तुत है।
धर्म के नाम पर चंदा और लूट।
हाल ही में अमर उजाला में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार, अयोध्या स्थित राम मंदिर की दान राशि में कथित गबन के मामले की जांच गोपनीय ढंग से कराई जा रही है। समाचार में बताया गया है कि ट्रस्ट दान गणना प्रणाली, सीसीटीवी फुटेज और नकदी प्रबंधन प्रक्रिया की तकनीकी पड़ताल कर रहा है। जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित नहीं होगा, लेकिन इस खबर ने एक बार फिर धार्मिक संस्थाओं में वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रश्न को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
धर्मस्थलों में दिया जाने वाला दान श्रद्धा, विश्वास और आस्था का प्रतीक होता है। लोग अपनी मेहनत की कमाई का एक हिस्सा इस उम्मीद के साथ अर्पित करते हैं कि उसका उपयोग धर्म, समाज और जनकल्याण के कार्यों में होगा। लेकिन यदि उसी दान में गबन, भ्रष्टाचार या अनियमितता की शिकायतें सामने आएँ, तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि श्रद्धालुओं के विश्वास के साथ भी विश्वासघात है।
चोरी, चोरी ही होती है, चाहे उसे कोई भी करे। और जब यह चोरी धर्म की आड़ में की जाए तथा वही लोग दूसरों को ईमानदारी और नैतिकता का उपदेश देते हों, तब उसका अपराध और भी गंभीर हो जाता है। पवित्र क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“ऐ ईमान वालो! तुम वह बात क्यों कहते हो जिस पर स्वयं अमल नहीं करते? अल्लाह के निकट यह बहुत नापसंद बात है कि तुम वह कहो जो करते नहीं हो।”
(सूरह अस-सफ़ 61:2-3)
यह समस्या किसी एक धर्म, संस्था या समुदाय तक सीमित नहीं है। कहीं मंदिरों के दान पर प्रश्न उठते हैं, तो कहीं मस्जिदों, मदरसों, गुरुद्वारों, चर्चों और अन्य धार्मिक संस्थाओं के चंदों के उपयोग पर सवाल खड़े होते हैं। छोटी-छोटी राशियाँ मिलकर सालाना करोड़ों और अरबों रुपये का रूप ले लेती हैं। ऐसे में यह जानना जनता का अधिकार है कि यह धन कहाँ और कैसे खर्च हो रहा है।
दुर्भाग्य से अनेक मामलों में न तो पूरा हिसाब सार्वजनिक किया जाता है और न ही कोई पूछने का साहस करता है। यदि किसी धार्मिक संस्था का प्रबंधन ईमानदार है, तो उसे पारदर्शिता से डरने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। नियमित ऑडिट, सार्वजनिक वित्तीय रिपोर्ट और आय-व्यय का खुला विवरण श्रद्धालुओं के विश्वास को और अधिक मजबूत करेगा।
सरकार का भी दायित्व है कि वह किसी भी प्रकार के आर्थिक अपराध की निष्पक्ष जांच करे, चाहे वह किसी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च या अन्य धार्मिक संस्था से संबंधित हो। साथ ही, जिन लोगों पर दान और चंदे की जिम्मेदारी है, उनकी आय और संपत्ति के स्रोतों की भी जांच होनी चाहिए, यदि उन पर गंभीर आरोप हों।
लेकिन केवल सरकार पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। जनता को भी सजग और जागरूक होना होगा। दान देते समय यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि उसका उपयोग वास्तव में जनहित, सेवा और धार्मिक उद्देश्यों के लिए हो रहा है या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि श्रद्धा का धन कुछ लोगों की निजी तिजोरियाँ भरने का माध्यम बन गया हो?
धर्म समाज को नैतिकता, ईमानदारी और जवाबदेही का संदेश देता है। इसलिए धार्मिक संस्थाओं को इन मूल्यों का सबसे बड़ा उदाहरण बनना चाहिए। आस्था का सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा जब दान और चंदे का हर पैसा पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ उपयोग किया जाए।
हिसाब होना चाहिए — और सबका होना चाहिए।
खुर्शीद अहमद सिद्दीकी
(ग़ुलाम-ए-मुस्तफ़ा)





