उत्तर प्रदेश के मेरठ से जुड़ा एक मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान चर्चा में आ गया। अदालत ने आदेश के बावजूद एक आरोपी को पेश नहीं किए जाने पर मेरठ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को सुनवाई पूरी होने तक खड़े रहने का निर्देश दिया। यह मामला दुष्कर्म के एक केस में जमानत रद्द करने की याचिका से जुड़ा था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।
दरअसल, पीड़िता ने आरोपी की जमानत रद्द करने की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। आरोप है कि आरोपी ने पीड़िता से शादी करने की प्रतिबद्धता के आधार पर जमानत हासिल की थी, लेकिन बाद में वह अपने वादे से मुकर गया। इसके बाद हाईकोर्ट ने आरोपी को पेश करने के लिए गैर-जमानती वारंट जारी किया था।
सुनवाई के दौरान मेरठ SSP ने अदालत को बताया कि आरोपी को पहले पेश नहीं किया जा सका, क्योंकि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के सामने पेश किए जाने के बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि गैर-जमानती वारंट का पालन सुनिश्चित करना SSP की जिम्मेदारी थी और आरोपी को अदालत में पेश कराना उनका दायित्व था।
शनिवार को आरोपी अदालत में पेश हुआ, लेकिन उसने पीड़िता से शादी करने से इनकार कर दिया। इसके बाद हाईकोर्ट ने उसकी जमानत रद्द कर दी। अदालत ने SSP को भविष्य में अधिक सावधानी बरतने का निर्देश भी दिया। साथ ही, मेरठ के CJM के आचरण पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट ने प्रशासनिक न्यायाधीश को उनके खिलाफ उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
इस मामले में हाईकोर्ट की कार्रवाई को न्यायिक आदेशों के पालन और पुलिस-प्रशासन की जवाबदेही से जोड़कर देखा जा रहा है। अदालत ने साफ किया कि न्यायिक आदेशों का पालन सुनिश्चित करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है।





