लोकेशन – समस्तीपुर
रिपोर्ट – नवनीत कुमार झा
मोहनपुर, मोहिउद्दीननगर और विद्यापतिनगर में युद्धस्तर पर राहत-बचाव | 192 नावें, 58 सामुदायिक रसोई, 18 मेडिकल कैंप और 17 पशु राहत कैंप सक्रिय
समस्तीपुर। गंगा और बाया नदी के उफान ने एक बार फिर समस्तीपुर के तटीय और दियारा इलाकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मोहनपुर, मोहिउद्दीननगर और विद्यापतिनगर प्रखंडों में बाढ़ का पानी कई गांवों और संपर्क मार्गों तक पहुंच चुका है। लेकिन इस बार प्रशासन की तैयारी और राहत तंत्र पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय नजर आ रहा है। जिला प्रशासन के अनुसार, मौजूदा चरण में तीनों प्रखंडों में 2,33,212 लोग प्रभावित हैं और राहत-बचाव के लिए सरकारी मशीनरी को बड़े पैमाने पर मैदान में उतारा गया है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 5 सितंबर की मीडिया रिपोर्ट में 56 से अधिक गांवों के बाढ़ की चपेट में आने और करीब दो लाख आबादी प्रभावित होने की बात सामने आई थी। कई ग्रामीण रास्ते डूबने के बाद नाव ही आवागमन का प्रमुख साधन बन गई है। मोहिउद्दीननगर और मोहनपुर के दियारा क्षेत्रों में स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण बताई गई।
इस बार राहत का पूरा नेटवर्क तैयार
प्रशासन ने प्रभावित लोगों तक भोजन पहुंचाने के लिए 58 सामुदायिक रसोइयां शुरू की हैं। इनसे अब तक करीब 25,858 लोगों को भोजन उपलब्ध कराया जा चुका है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राहत केवल रसोई केंद्रों तक सीमित नहीं है। जहां बाढ़ के पानी ने लोगों को घरों में ही रोक दिया है, वहां नाव के जरिए घरों और यहां तक कि छतों तक भोजन पहुंचाया जा रहा है। मोहिउद्दीननगर के रासपुर पतसिया पश्चिम में ऐसे परिवारों तक नाव से भोजन पहुंचाने की व्यवस्था की गई है, जिनका बाहर निकलना संभव नहीं है।
प्रशासन ने तत्काल आश्रय और बारिश से बचाव के लिए 31,398 पॉलिथीन शीट वितरित की हैं। जरूरत वाले इलाकों में अतिरिक्त सामग्री पहुंचाने की व्यवस्था भी रखी गई है।
192 नावें बनीं लाइफलाइन
बाढ़ प्रभावित इलाकों में आवागमन और राहत सामग्री पहुंचाने के लिए 192 नावों का परिचालन किया जा रहा है। नावों से लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के साथ खाद्य सामग्री और अन्य जरूरी सामान भी पहुंचाया जा रहा है। प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा नावों की उपलब्धता और संचालन की लगातार समीक्षा की जा रही है।
मोहिउद्दीननगर में स्थानीय प्रशासन ने जरूरत के हिसाब से नावों की संख्या बढ़ाने की तैयारी भी रखी है। एक स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक प्रखंड क्षेत्र में कई चिन्हित स्थानों पर सरकारी नावों का संचालन किया जा रहा है और आवश्यकता बढ़ने पर अतिरिक्त नावें लगाने की बात कही गई है।
स्वास्थ्य सेवा भी बाढ़ के बीच पहुंची
बाढ़ के साथ बीमारियों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ने को देखते हुए 18 मेडिकल कैंप संचालित किए जा रहे हैं। इन शिविरों में स्वास्थ्य जांच, चिकित्सकीय परामर्श और आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। अधिकारियों ने स्वास्थ्य विभाग की टीमों को प्रभावित इलाकों में लगातार सक्रिय रहने के निर्देश दिए हैं।
एडीएम आपदा प्रबंधन के निरीक्षण के दौरान सामुदायिक रसोई, दवाओं के स्टॉक, नावों की उपलब्धता, प्रभावित लोगों के ठहरने की व्यवस्था और गोताखोरों की तैनाती तक की समीक्षा की गई। इससे संकेत मिलता है कि राहत व्यवस्था को केवल भोजन वितरण तक सीमित न रखकर बहुस्तरीय आपदा प्रबंधन के रूप में संचालित किया जा रहा है।
पशुधन को बचाने की भी तैयारी
बाढ़ में सबसे बड़ी चिंता सिर्फ इंसानों की नहीं, बल्कि पशुधन की भी होती है। इस बार प्रशासन ने पशुओं के लिए भी अलग राहत व्यवस्था की है। 17 पशु राहत/शेड कैंप बनाए गए हैं और 17 पशु चिकित्सा कैंप संचालित किए जा रहे हैं। अब तक 216 क्विंटल पशु चारा और भूसा वितरित किया जा चुका है, जबकि 264 पशुओं को चिकित्सा सुविधा और दवा दी जा चुकी है।
2025 बनाम 2026 : बाढ़ की तस्वीर बदली, राहत का ढांचा भी बदला
पिछले वर्ष यानी 2025 में इसी इलाके में बाढ़ का असर शुरुआती दौर में 18 पंचायतों, 43 गांव/वार्ड और करीब 30 हजार आबादी तक बताया गया था। उस समय मोहनपुर में 11 पंचायत और करीब 17 हजार आबादी प्रभावित बताई गई थी। मोहिउद्दीननगर में पतसिया पश्चिम, पतसिया पूर्वी और हरैल तथा विद्यापतिनगर में मऊ धनेशपुर, शेरपुर, बालकृष्णपुर और बाजितपुर प्रभावित पंचायतों में शामिल थे। प्रशासन ने उस समय संभावित क्षेत्रों के लिए 50 नावें सुरक्षित रखने और जरूरत पड़ने पर सामुदायिक रसोई शुरू करने की तैयारी की थी।
2025 की एक बाद की रिपोर्ट में मोहिउद्दीननगर के 25, मोहनपुर के 22 और विद्यापतिनगर के 4 स्कूलों सहित कुल 51 विद्यालयों में बाढ़ के पानी के प्रवेश का उल्लेख किया गया था। उसी रिपोर्ट में प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य कैंप और राहत व्यवस्था को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष की बात भी सामने आई थी।
2026 में तस्वीर अलग है। इस बार बाढ़ का दायरा काफी बड़ा बताया जा रहा है और 2.33 लाख से अधिक आबादी प्रभावित है। इसके समानांतर राहत तंत्र भी पहले से अधिक व्यापक रूप में सक्रिय दिखाई दे रहा है- 58 सामुदायिक रसोई, 18 मेडिकल कैंप, 192 नावें, 17 पशु राहत/शेड कैंप और 17 पशु चिकित्सा कैंप लगातार काम कर रहे हैं।
यानी चुनौती बड़ी, लेकिन तैयारी भी बड़ी
2025 की उपलब्ध रिपोर्टों में जहां कई क्षेत्रों में राहत व्यवस्था शुरू करने की मांग और तैयारियों की चर्चा प्रमुख थी, वहीं 2026 में प्रशासन पहले से राहत संसाधनों को सक्रिय करने, क्षेत्रीय निरीक्षण करने और जरूरत के अनुसार व्यवस्थाओं का विस्तार करने पर जोर दे रहा है। हालांकि प्रभावितों की संख्या इस साल कहीं अधिक है, इसलिए राहत व्यवस्था की वास्तविक सफलता का पैमाना केवल संसाधनों की संख्या नहीं, बल्कि हर प्रभावित परिवार तक समय पर भोजन, चिकित्सा, नाव, आश्रय और पशु चारा पहुंचना होगा।
डीएम से मंत्री तक-मैदान में लगातार निगरानी
बाढ़ की स्थिति पर जिला प्रशासन की ओर से लगातार निगरानी की जा रही है। जिलाधिकारी ने मोहिउद्दीननगर और मोहनपुर के प्रभावित क्षेत्रों का स्थल निरीक्षण कर जलस्तर, आवागमन, तटबंधों की सुरक्षा और लोगों को मिल रही सुविधाओं का जायजा लिया था। अधिकारियों को कैंप मोड में काम करने का निर्देश दिया गया।
इसके बाद एडीएम आपदा प्रबंधन ने भी प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण कर सामुदायिक रसोई, दवाओं, पशु चारा, नावों और राहत व्यवस्था की समीक्षा की।
वहीं केंद्रीय गृह राज्य मंत्री एवं उजियारपुर सांसद नित्यानंद राय ने 8 सितंबर को मोहिउद्दीननगर और मोहनपुर के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर पीड़ितों से बातचीत की और राहत व्यवस्था का जायजा लिया। उन्होंने प्रभावितों को हरसंभव सहायता का भरोसा दिलाया।
बाढ़ के बीच सबसे बड़ी चुनौती-लोगों तक राहत की अंतिम पहुंच
प्रशासन ने राहत का नेटवर्क तो खड़ा कर दिया है, लेकिन जमीन पर चुनौती अब भी बड़ी है। कई दियारा और तटीय इलाकों में सड़क संपर्क बाधित है। 56 से अधिक गांवों के प्रभावित होने और कई संपर्क मार्गों के डूबने की रिपोर्ट सामने आ चुकी है। ऐसे में राहत केंद्र तक पहुंचने की बजाय राहत को घर-द्वार तक पहुंचाना प्रशासन की अगली बड़ी परीक्षा है।
मोहिउद्दीननगर में नाव से छतों तक भोजन पहुंचाने की व्यवस्था इस चुनौती का उदाहरण है। यह व्यवस्था बताती है कि बाढ़ का पानी जहां सामान्य राहत वितरण को रोक रहा है, वहां प्रशासन और स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक तरीके अपनाए जा रहे हैं।



















