February 8, 2023

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पश्चिम बंगाल में गंगा की सेहत सबसे खराब

हरिद्वार से लेकर पश्चिम बंगाल तक गंगा नदी का केवल 18 प्रतिशत हिस्सा ही ऐसा है, जिसे जलीय जीवों के रहने, प्रदूषण की मात्रा कम होने आदि के आधार पर बेहतर पाया गया है। यह वह क्षेत्र है जहां संरक्षित वन क्षेत्र या अभ्यारण्य हैं।

नमामि गंगे परियोजना के तहत परियोजना वैज्ञानिक डॉ.शिवानी बड़थ्वाल के मुताबिक बिजनौर से नरोरा तक करीब 150 किलोमीटर क्षेत्र में गंगा की सेहत सबसे बेहतर पाई गई। इसी तरह पश्चिम बंगाल में नवदीप क्षेत्र का पांच किलोमीटर का क्षेत्र गंगा में जलीय जीवों के लिए बेहतर पाया गया। इन क्षेत्रों में खनन नहीं हो रहा है और यहां संरक्षित क्षेत्र हैं। झारखंड में फर्रुखा बैराज में पानी रुकने की वजह से कानपुर, वाराणसी आदि में गंगा की सेहत खराब पाई गई।विज्ञापन

निचले क्षेत्र में सबसे हानिकारक तत्व

परियोजना सहायक रुचिका शाह के मुताबिक गंगा के निचले क्षेत्र में सबसे अधिक हानिकारक  तत्व पाए गए। डीडीटी सहित 13 प्रतिबंधित कीटनाशक गंगा के पानी में पाए गए। पानी सबसे अधिक प्रदूषण रहित उन क्षेत्रों में पाया गया, जहां किसी न किसी का संगम गंगा से हो रहा है। इसके अलावा निकिल, कोबाल्ट जैसे भारी तत्व भी गंगा के पानी में पाए गए।   

पश्चिम बंगाल में गंगा की सेहत सबसे खराब
देहरादून। नमामि गंगे की प्रोजेक्ट एसोसिएट रुचिका शाह के शोध से सामने आया कि पश्चिम बंगाल में गंगा की सबसे खराब हालत है। यहां प्रतिबंधित कीटनाशक अधिक मात्रा में पाए गए। इसका कारण यह भी है कि पश्चिम बंगाल में गंगा के किनारे खासी खेती होती है। यहां मौजूद सुंदरवन जैव विविध क्षेत्र के संयुक्त निदेशक डा. एस कुलनदेवल ने संस्थान से आग्रह किया कि इस रिपोर्ट को पश्चिम बंगाल की सरकार को तुरंत भेजा जाए। 

उत्तराखंड में भी गंगा में पाए गए प्रतिबंधित कीटनाशक
शाह के मुताबिक इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि मध्य गंगा क्षेत्र से बारिश के साथ यह कीटनाशक उत्तराखंड में पहुंच गए। डीडीटी सहित ये प्रतिबंधित कीटनाशक लंबे समय तक विघटित नहीं होते। 

90 प्रतिशत गंगा का पानी हो रहा खर्च

गंगा नदी का करीब 90 प्रतिशत पानी औद्योगिक, सिंचाई और घरेलू उपयोग में खर्च हो रहा है। भारतीय वन्यजीव संस्थान में आयोजित नमामि गंगे सेमीनार के उद्घाटन सत्र में संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक और नमामि गंगे परियोजना से जुडे़ डा. एसए हुसैन ने कहा कि यह स्थिति चिंताजनक है। 

सत्र में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हैस्को के संस्थापक निदेशक और पद्मश्री डा. अनिल जोशी ने कहा कि नदियां बचेंगी तो हम बचेंगे। नदियां ही हमारा वर्तमान और भविष्य हैं। उन्होंने कहा कि संस्थानों को शोध धरातल पर उतारना चाहिए। शोध ऐसा हो जिसका व्यवहार में उपयोग किया जा सके। शहरों का शिक्षित वर्ग अधिक से अधिक उपभोग की कोशिश तो करता है लेकिन बदले में बहुत कम देता है। इससे असंतुलन पैदा हो रहा है। डा. एसए हुसैन ने नमामि गंगे परियोजना की जानकारी दी और कहा कि गंगा अभियान के तहत अब सचल केंद्र स्थापित करने की भी तैयारी की जा रही है। 

सत्र में गंगा नदी में कछुओं पर आधारित वैब आधारित एक कार्टून फिल्म भी जारी की गई। यह फिल्म बच्चों को ध्यान में रखकर बनाई गई है और इसमें गंगा में रहने वाले एक छोटे नीला कछुए के सामने आ रही चुनौतियों को पेश किया गया है। इसके साथ ही आद्रभूमि पर जागरूकता, गंगा प्रहरियों का प्रशिक्षण कार्यक्रम आदि से संबंधित साहित्य भी जारी किया गया। सत्र में मौजूद वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. वाईवी झाला ने कहा कि शोध में अनुशासन का महत्व है। वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. रुची बडोला ने स्वागत किया।  

नमामि गंगे अभियान के दूसरे चरण की तैयारी शुरू

नमामि गंगे अभियान के दूसरे चरण के तहत अब गंगा नदी के जल संग्रहण क्षेत्र की सहायक नदियों, धाराओं की जलीय विविधता के संरक्षण के लिए एक्शन प्लान तैयार किया जाएगा। जल शक्ति मंत्रालय ने इसको हरी झंडी दे दी है और भारतीय वन्यजीव संस्थान ने इसकी तैयारी शुरू कर दी है। अभियान का दूसरा चरण जनवरी 2020 में अधिकारिक रूप से घोषित किया जाएगा। 

नमामि गंगे परियोजना से जुड़े वैज्ञनिकों के मुताबिक 2016 में नमामी गंगे अभियान का पहला चरण शुरू किया गया था। इसके तहत मध्य गंगा से लेकर निचली गंगा तक नदी के जलीय जीवों की जानकारी हासिल की गई, गंगा की सेहत नापी गई और सामुदायिक सहयोग से संरक्षण कार्य किए गए। पहले चरण में यह चुनौती भी उभर कर सामने आई कि घनी मानव आबादी वाले क्षेत्रों में नदी को संरक्षित कैसे रखा जाए।

इसके तहत रेस्क्यू सेंटर स्थापित किए गए, भारतीय वन्यजीव संस्थान में गंगा संरक्षण केंद्र स्थापित किया गया और संबंधित पक्षों को गंगा संरक्षण के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराया गया। करीब 500 गंगा प्रहरी तैयार किए गए हैं और 115 ग्राम पंचायतों को नदी संरक्षण कार्य में सक्रिय रूप से शामिल किया गया है। गंगा के करीब 1100 किलोमीटर के प्रवाह में करीब 140 किलोमीटर नदी में प्रचुर मात्रा में जलीय जीव पाए गए। यह घनी आबादी वाले क्षेत्र भी हैं और अब चुनौती यह है कि इन क्षेत्रों में मानव गतिविधियों के दबाव के बीच संरक्षण के काम को कैसे अंजाम दिया जाए। 

भारतीय वन्यजीव संस्थान ने काम शुरू किया

भारतीय वन्यजीव संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. एसए हुसैन के मुताबिक अभियान के दूसरे चरण में गंगा की सहायक नदियों और जल संग्रहण क्षेत्र की आद्रभूमि में इस काम को आगे बढ़ाया जाएगा। अभियान के लिए नमामि गंगे मुहिम के तहत अनुमति मिल गई है और भारतीय वन्यजीव संस्थान ने काम भी शुरू कर दिया है। यमुना, कोसी, घाघरा सहित अन्य सहायक नदियों के अध्ययन, जलीय जीवों के संसार आदि की जानकारी हासिल की जाएगी। अब गंगा के उप जल संग्रहण क्षेत्रों में जलीय जीवों के संरक्षण का एक्शन प्लान तैयार किया जाएगा। करीब नौ प्रोजेक्ट उप जल संग्रहण क्षेत्रों के लिए ही होंगे।

आद्र भूमि पर रहेगा फोकस
अभियान के दूसरे चरण में भारतीय वन्यजीव संस्थान का फोकस आद्रभूमि पर रहेगा। आद्रभूमि (वैटलैंड) ऐसी भूमि हैं जहां जलस्तर सामान्य रूप से सतह के पास रहता है। ये पानी के भंडार ही हैं जो नदी के प्रवाह को बनाए रखते हैं और प्रदूषित जल को छानते हैं, भूजल को रिचार्ज करते हैं। इसके पारिस्थितिकीय तंत्र में पौधों और जीवों की कई प्रजातियां शामिल होती हैं। 

सौ और शोधार्थियों की जरूरत
नमामि गंगे के दूसरे चरण में विभिन्न अध्ययनों के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान को करीब सौ और शोधार्थियों की जरूरत होगी। पहले चरण में संस्थान ने करीब इतने ही शोध करने वालों, वैज्ञानिकों आदि का सहयोग लिया था। 

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